दरवाज़े क्या होते हैं क्या दरवाज़े बाहर जाने के लिए हैं या सिर्फ़ अंदर आने के लिए दरवाज़ों का दुरुस्त मसरफ़ समझने से फ़लसफ़ी क़ासिर रहे हम तमाम उम्र इन की हक़ीक़त से ना-आश्ना रहे हमें मा'लूम न हो सका और दरवाज़े हमारे अंदर से ख़ारिज हो गए या शायद अपने ही अंदर दाख़िल हो गए दाख़िल और ख़ारिज होने की बहस जारी थी कि दरवाज़ों को दवाम बख़्शा जा सके लेकिन दरवाज़ों की ख़ुद-कुशी से मुदावमत की मौत वाक़े' हो गई
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"सुनो शादी मुबारक हो" सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब बता भी दो कि सुनने को वो ख़ुश-ख़बरी मैं आऊँ अब किसी दिन छोड़ जाएगी तेरे बेटे को कोई जब किसी आशिक़ की माँ का दुख समझ पाए तू शायद तब इसे इंसाफ़ कहते हैं इसी से भागते हैं सब इसी को पूजता हूँ मैं इसी से काँपते हैं रब मगर तब तक मुनासिब है तड़प को बोलना करतब सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब
Anant Gupta
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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
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मैं तन्हा था कल भी और आज भी मैं जानता था कि मैं नीला हूँ लेकिन तुम्हारी आवाज़ पर मैं बाहर निकल आया गोरे काले और ख़ाकिस्तरयों के दरमियान और अब मैं ज़ख़्मी हूँ काश तुम मुझ से नफ़रत करतीं तो मैं वापस तन्हाई के तने में छुप जाता जहाँ मेरे आँसू शाख़ों पर उगते और मैं फ़न के मीठे फल देता तुम ने जब जब आवाज़ दी मेरी तन्हाई मुझ से रूठ गई और मैं हर बार कराहता हुआ लौटा रहम एक अफ़्साना है मुझ पर लिख डालो कभी तो एहसास को उँगलियों पे गिन डालो मैं अपने ग़मों और ख़ुशियों ईदों और शब-रातों की साथी अपनी दुल्हन तन्हाई को भैरवीं के कोमल सुरों की तरह सदा सुहागन रखूँगा
Tabassum Zia
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मेरे दिल में उगती प्यार की फ़स्ल को जब लोगों की नफ़रत के फ़ुज़्ले की खाद मिली तो सिटे चमक कर सोना हो गए फिर वही फ़स्ल काटने का वक़्त आया तो मेरे ख़ुलूस की दरांती कुंद हो गई और दिल शिकम के आँसुओं से भर आया दरांती ख़ूब चलाई गई लेकिन फ़स्ल न कटी मेरे हाथों पर कीचड़ लगा हुआ था सिटे नीले हो चुके थे मोहब्बत ने ख़ुलूस के साथ निय्यत को उठा कर नफ़रत के फ़ुज़्ले पे पटख़ डाला और दर्द ने मोहब्बत के उपले नाफ़ पर थापना शुरूअ' कर दिए
Tabassum Zia
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फ़न के बुत-कदे में दाख़िल हो कर अपने रंगों में हाथ घोलना अपनी शाइ'री की बंसी बजाना अपने अफ़्सानों के हर एक सनम से मुख़ातब होना और सुरों से हम-कलाम होना फ़नकार की ज़िंदगी का ख़ुलासा है फ़नकार फ़न खाता है फ़न ओढ़ता है फ़न देखता है फ़न सुनता है लेकिन उस की मुसव्विरी उस की शाइ'री उस की मौसीक़ी और उस की कहानियों का नतीजा अलमिया है मजीद-'अमजद' अपनी दुल्हन के पहलू में जान दे कर उसे सुहागन रखता है और माज़ी का हिस्सा बन कर हाल में ज़िंदा रहता है फ़नकार की ख़ानक़ाह लंगर से मावरा है
Tabassum Zia
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गर्मियों के मौसम में लालटैन की आग सेंकते हैं तो ठंडा बल्ब मुस्कुराता है और हमारी बेबसी पर मुँह चिड़ाता है बहुत सी हड्डियाँ खाल के थैले में पड़ी चुभती रहती हैं रोज़ाना कई कुत्ते ख़ुराक की तलाश में मसरूफ़ कचरे के ढेर पे एक दूसरे पर ग़ुर्राते हैं ज़मीन के बालों में कंघी करती गर्म सर्द हवाएँ ख़यालों की पुरानी देग में बास मारते ख़्वाब कोलुहओं की भट्टी के पास जलता सर्द ख़ून आहें भरती पैरों में बिखरी सिसकियाँ अंजान सड़क पे उधड़ा पड़ा ला-वारिस पेट जिसे अजनबी शो'बदा-बाज़ हँसी की ठोकरें मार कर गुज़र जाते हैं
Tabassum Zia
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तुम्हें पता है मोहब्बत क्या है नहीं मैं बताता हूँ तुम्हें पिछले दिसम्बर तक ये जज़्बा मुझ में इस क़दर था कि मेरी क़ल्ब-दानी में मोहब्बत का हमल ठहर गया वो मेरे दिल की कोख में पलती रही वो ज़िंदा थी मैं ने एक लम्स को महसूस किया था बस ज़रा सी जल्दी ने वक़्त से पहले उसे जन्म दिया और वो मरहूम हो गई
Tabassum Zia
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