nazmKuch Alfaaz

"मुझ को लगता है" मुझ को लगता है कि तुम्हारा फ़ोन आएगा बहुत रोओगी मुझ पर बहुत चिल्लाओगी तुम बहुत बातें होंगी फिर से और ये पूछोगी तुम कब तक करूँँ मैं कॉल पर बातें कब तक तुम को वीडियो कॉल पर देखूं ये बताओ मुझ को कि मिलने कब आओगे तुम? मुझ को लगता है कि तुम्हारा मैसेज आएगा आई मिस यूँ का एक मुझ को टेक्स्ट आएगा मुझ सेे मेरी एक पिक माँगोगी और देख कर फोटो झट से चूम लोगी तुम फिर ये पूछोगी मुझ सेे कि मिलने कब आओगे तुम? मैं ये जानता हूँ लेकिन अब किसी और की हो तुम मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा फ़ोन आएगा मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा मैसेज आएगा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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" दोस्त " दोस्त तुम मुझ को भूल गए हो ना दोस्त कहीं ऐसा न हो मैं मर जाऊँ और तब तुम को ख़याल आए कि एक तुम्हारा दोस्त था वही जिस का बस एक तुम्हीं दोस्त थे दोस्त हो दोस्त तुम्हारे साथ मैं ख़ुश रहता था दोस्त अब मैं ख़ुश नहीं हूँ मेरे साथ बहुत कुछ बुरा हुआ इन दिनों मेरा सब कुछ मुझ सेे जुदा हुआ इन दिनों सब कुछ में सब कुछ एक तुम ही तो थे दोस्त दोस्त मैं जानता हूँ तुम्हें एक न एक दिन एहसास होगा मगर कहीं ऐसा न हो तब तक बहुत देर हो जाए दोस्त कहीं ऐसा न हो तुम को मैं बेजान लेटा हुआ दिखूँ ख़ैर फिर भी रोना नहीं मेरे मरने पर ये भी मत सोचना कि तुम ने मुझे फिर से खो दिया है दोस्त तुम महसूस करना कि मैं अब भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी रहा हूँ दोस्त तुम महसूस करना तुम्हारे साथ बाइक पर बैठा हुआ हूँ दोस्त तुम महसूस ये भी करना मैं तुम्हें गालियां दे रहा हूँ

Kabir Altamash

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"बेकार फूल" हम हैं किसी दरख़्त का सब सेे पहला सब सेे बेकार फूल हम ने झेले हैं रौशनी के नाम पर कई अज़ाब हम ने देखा है ख़ुद को इक टहनी से टूटते हुए हम ने देखा है क़िस्मत को रूठते हुए हमें कहाँ नसीब के कोई दुख हमारा देखे और देखे तो कोई क्यूँ ख़ुदारा देखे किसी दिन हमें भी इक लड़की को सौंप दिया जाएगा किसी दिन हम भी मुरझा जाएँगे किसी दिन वो लड़की भी किताब में रख कर हम को भूल जाएगी किसी दिन हम भी सूख जाएँगे

Kabir Altamash

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"ग्यारह बरस" यूँँ उदास रहते रहते ग्यारह बरस बीतने को हैं इन ग्यारह बरसों ने मुझे तोड़ कर रख दिया हाँ ये भी है कि बहुत कुछ सीख गया हूँ कि कैसे हँसते हैं ना चाहते हुए भी और कैसे रोकते हैं उन आँसुओं को जो बहना चाहते हों सिगरेट के सहारे कैसे करते हैं मौत को और क़रीब कैसे जीते हैं मौत को कैसे करते हैं ख़ुद को उदास कैसे होते हैं ख़ुद ही सब सेे दूर कैसे रहते हैं बस ख़ुद ही के पास कैसे करते हैं भूले हुओं को याद कैसे करते हैं ख़ुद को बर्बाद जान गया हूँ असली हँसी की क़ीमत जान गया हूँ ऐ ज़िन्दगी तेरी हक़ीक़त ख़ाली बैठ कर बस यही सोचता हूँ मैं क्या ग्यारह बरसों से मर रहा हूँ मैं?

Kabir Altamash

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"लौट कर मत आना" हो किस्मत में तुम नहीं मेरे है हक़ीक़त भी तुम नहीं मेरे मगर है ये सच भी कि तुम्हें छोड़ नहीं सकता मैं ख़ुद का ही दिल तोड़ नहीं सकता चलो एक एहसान करो मुझ पे तुम ख़ुद ही दूर हो जाओ मुझ सेे करो वा'दा ये मुझ सेे कि मुझे तुम भूल जाओगे हँसोगे मेरे बिन भी कि एक दिन दूर जाओगे बहुत आएगी याद मेरी है क़सम तुझे मेरी तुम लौट कर मत आना तुम लौट कर मत आना

Kabir Altamash

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"शाइ'र" उस सेे कहना कि रोए नहीं उस सेे कहना कि रोने से भी वो वापस नहीं आएगा उस सेे कहना कि रोना ठीक नहीं उस सेे कहना कि तुम हंसती हुई अच्छी लगती हो उस को समझाना सब कुछ ठीक है कुछ नहीं बिगड़ा उस को कहना कि वो अब भी तुम्हारे साथ है, तुम्हारे पास है उस को ये बताना कि उस की सारी ग़ज़लें तुम्हारी दी हुई हैं और उस को बताना कि तुम उस की सब सेे ख़ूब-सूरत ग़ज़ल हो उस सेे कहना कि वो तुम्हारा कोई भी वा'दा निभा नहीं सका उस सेे कहना कि ख़ुदा ने उसे वक़्त कम दिया उस सेे कहना कि वो इतनी जल्दी जाना नहीं चाहता था उस को ये बार बार मत कहना कि वो लड़का अब मर चुका है उस सेे कहना कि वो शाइ'र था और शाइ'र कभी नहीं मरता

Kabir Altamash

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