" दोस्त " दोस्त तुम मुझ को भूल गए हो ना दोस्त कहीं ऐसा न हो मैं मर जाऊँ और तब तुम को ख़याल आए कि एक तुम्हारा दोस्त था वही जिस का बस एक तुम्हीं दोस्त थे दोस्त हो दोस्त तुम्हारे साथ मैं ख़ुश रहता था दोस्त अब मैं ख़ुश नहीं हूँ मेरे साथ बहुत कुछ बुरा हुआ इन दिनों मेरा सब कुछ मुझ सेे जुदा हुआ इन दिनों सब कुछ में सब कुछ एक तुम ही तो थे दोस्त दोस्त मैं जानता हूँ तुम्हें एक न एक दिन एहसास होगा मगर कहीं ऐसा न हो तब तक बहुत देर हो जाए दोस्त कहीं ऐसा न हो तुम को मैं बेजान लेटा हुआ दिखूँ ख़ैर फिर भी रोना नहीं मेरे मरने पर ये भी मत सोचना कि तुम ने मुझे फिर से खो दिया है दोस्त तुम महसूस करना कि मैं अब भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी रहा हूँ दोस्त तुम महसूस करना तुम्हारे साथ बाइक पर बैठा हुआ हूँ दोस्त तुम महसूस ये भी करना मैं तुम्हें गालियां दे रहा हूँ
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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"ग्यारह बरस" यूँँ उदास रहते रहते ग्यारह बरस बीतने को हैं इन ग्यारह बरसों ने मुझे तोड़ कर रख दिया हाँ ये भी है कि बहुत कुछ सीख गया हूँ कि कैसे हँसते हैं ना चाहते हुए भी और कैसे रोकते हैं उन आँसुओं को जो बहना चाहते हों सिगरेट के सहारे कैसे करते हैं मौत को और क़रीब कैसे जीते हैं मौत को कैसे करते हैं ख़ुद को उदास कैसे होते हैं ख़ुद ही सब सेे दूर कैसे रहते हैं बस ख़ुद ही के पास कैसे करते हैं भूले हुओं को याद कैसे करते हैं ख़ुद को बर्बाद जान गया हूँ असली हँसी की क़ीमत जान गया हूँ ऐ ज़िन्दगी तेरी हक़ीक़त ख़ाली बैठ कर बस यही सोचता हूँ मैं क्या ग्यारह बरसों से मर रहा हूँ मैं?
Kabir Altamash
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"बेकार फूल" हम हैं किसी दरख़्त का सब सेे पहला सब सेे बेकार फूल हम ने झेले हैं रौशनी के नाम पर कई अज़ाब हम ने देखा है ख़ुद को इक टहनी से टूटते हुए हम ने देखा है क़िस्मत को रूठते हुए हमें कहाँ नसीब के कोई दुख हमारा देखे और देखे तो कोई क्यूँ ख़ुदारा देखे किसी दिन हमें भी इक लड़की को सौंप दिया जाएगा किसी दिन हम भी मुरझा जाएँगे किसी दिन वो लड़की भी किताब में रख कर हम को भूल जाएगी किसी दिन हम भी सूख जाएँगे
Kabir Altamash
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"शाइ'र" उस सेे कहना कि रोए नहीं उस सेे कहना कि रोने से भी वो वापस नहीं आएगा उस सेे कहना कि रोना ठीक नहीं उस सेे कहना कि तुम हंसती हुई अच्छी लगती हो उस को समझाना सब कुछ ठीक है कुछ नहीं बिगड़ा उस को कहना कि वो अब भी तुम्हारे साथ है, तुम्हारे पास है उस को ये बताना कि उस की सारी ग़ज़लें तुम्हारी दी हुई हैं और उस को बताना कि तुम उस की सब सेे ख़ूब-सूरत ग़ज़ल हो उस सेे कहना कि वो तुम्हारा कोई भी वा'दा निभा नहीं सका उस सेे कहना कि ख़ुदा ने उसे वक़्त कम दिया उस सेे कहना कि वो इतनी जल्दी जाना नहीं चाहता था उस को ये बार बार मत कहना कि वो लड़का अब मर चुका है उस सेे कहना कि वो शाइ'र था और शाइ'र कभी नहीं मरता
Kabir Altamash
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"लौट कर मत आना" हो किस्मत में तुम नहीं मेरे है हक़ीक़त भी तुम नहीं मेरे मगर है ये सच भी कि तुम्हें छोड़ नहीं सकता मैं ख़ुद का ही दिल तोड़ नहीं सकता चलो एक एहसान करो मुझ पे तुम ख़ुद ही दूर हो जाओ मुझ सेे करो वा'दा ये मुझ सेे कि मुझे तुम भूल जाओगे हँसोगे मेरे बिन भी कि एक दिन दूर जाओगे बहुत आएगी याद मेरी है क़सम तुझे मेरी तुम लौट कर मत आना तुम लौट कर मत आना
Kabir Altamash
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"मुझ को लगता है" मुझ को लगता है कि तुम्हारा फ़ोन आएगा बहुत रोओगी मुझ पर बहुत चिल्लाओगी तुम बहुत बातें होंगी फिर से और ये पूछोगी तुम कब तक करूँँ मैं कॉल पर बातें कब तक तुम को वीडियो कॉल पर देखूं ये बताओ मुझ को कि मिलने कब आओगे तुम? मुझ को लगता है कि तुम्हारा मैसेज आएगा आई मिस यूँ का एक मुझ को टेक्स्ट आएगा मुझ सेे मेरी एक पिक माँगोगी और देख कर फोटो झट से चूम लोगी तुम फिर ये पूछोगी मुझ सेे कि मिलने कब आओगे तुम? मैं ये जानता हूँ लेकिन अब किसी और की हो तुम मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा फ़ोन आएगा मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा मैसेज आएगा
Kabir Altamash
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