"शाइ'र" उस सेे कहना कि रोए नहीं उस सेे कहना कि रोने से भी वो वापस नहीं आएगा उस सेे कहना कि रोना ठीक नहीं उस सेे कहना कि तुम हंसती हुई अच्छी लगती हो उस को समझाना सब कुछ ठीक है कुछ नहीं बिगड़ा उस को कहना कि वो अब भी तुम्हारे साथ है, तुम्हारे पास है उस को ये बताना कि उस की सारी ग़ज़लें तुम्हारी दी हुई हैं और उस को बताना कि तुम उस की सब सेे ख़ूब-सूरत ग़ज़ल हो उस सेे कहना कि वो तुम्हारा कोई भी वा'दा निभा नहीं सका उस सेे कहना कि ख़ुदा ने उसे वक़्त कम दिया उस सेे कहना कि वो इतनी जल्दी जाना नहीं चाहता था उस को ये बार बार मत कहना कि वो लड़का अब मर चुका है उस सेे कहना कि वो शाइ'र था और शाइ'र कभी नहीं मरता
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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" दोस्त " दोस्त तुम मुझ को भूल गए हो ना दोस्त कहीं ऐसा न हो मैं मर जाऊँ और तब तुम को ख़याल आए कि एक तुम्हारा दोस्त था वही जिस का बस एक तुम्हीं दोस्त थे दोस्त हो दोस्त तुम्हारे साथ मैं ख़ुश रहता था दोस्त अब मैं ख़ुश नहीं हूँ मेरे साथ बहुत कुछ बुरा हुआ इन दिनों मेरा सब कुछ मुझ सेे जुदा हुआ इन दिनों सब कुछ में सब कुछ एक तुम ही तो थे दोस्त दोस्त मैं जानता हूँ तुम्हें एक न एक दिन एहसास होगा मगर कहीं ऐसा न हो तब तक बहुत देर हो जाए दोस्त कहीं ऐसा न हो तुम को मैं बेजान लेटा हुआ दिखूँ ख़ैर फिर भी रोना नहीं मेरे मरने पर ये भी मत सोचना कि तुम ने मुझे फिर से खो दिया है दोस्त तुम महसूस करना कि मैं अब भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी रहा हूँ दोस्त तुम महसूस करना तुम्हारे साथ बाइक पर बैठा हुआ हूँ दोस्त तुम महसूस ये भी करना मैं तुम्हें गालियां दे रहा हूँ
Kabir Altamash
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"बेकार फूल" हम हैं किसी दरख़्त का सब सेे पहला सब सेे बेकार फूल हम ने झेले हैं रौशनी के नाम पर कई अज़ाब हम ने देखा है ख़ुद को इक टहनी से टूटते हुए हम ने देखा है क़िस्मत को रूठते हुए हमें कहाँ नसीब के कोई दुख हमारा देखे और देखे तो कोई क्यूँ ख़ुदारा देखे किसी दिन हमें भी इक लड़की को सौंप दिया जाएगा किसी दिन हम भी मुरझा जाएँगे किसी दिन वो लड़की भी किताब में रख कर हम को भूल जाएगी किसी दिन हम भी सूख जाएँगे
Kabir Altamash
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"लौट कर मत आना" हो किस्मत में तुम नहीं मेरे है हक़ीक़त भी तुम नहीं मेरे मगर है ये सच भी कि तुम्हें छोड़ नहीं सकता मैं ख़ुद का ही दिल तोड़ नहीं सकता चलो एक एहसान करो मुझ पे तुम ख़ुद ही दूर हो जाओ मुझ सेे करो वा'दा ये मुझ सेे कि मुझे तुम भूल जाओगे हँसोगे मेरे बिन भी कि एक दिन दूर जाओगे बहुत आएगी याद मेरी है क़सम तुझे मेरी तुम लौट कर मत आना तुम लौट कर मत आना
Kabir Altamash
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"ग्यारह बरस" यूँँ उदास रहते रहते ग्यारह बरस बीतने को हैं इन ग्यारह बरसों ने मुझे तोड़ कर रख दिया हाँ ये भी है कि बहुत कुछ सीख गया हूँ कि कैसे हँसते हैं ना चाहते हुए भी और कैसे रोकते हैं उन आँसुओं को जो बहना चाहते हों सिगरेट के सहारे कैसे करते हैं मौत को और क़रीब कैसे जीते हैं मौत को कैसे करते हैं ख़ुद को उदास कैसे होते हैं ख़ुद ही सब सेे दूर कैसे रहते हैं बस ख़ुद ही के पास कैसे करते हैं भूले हुओं को याद कैसे करते हैं ख़ुद को बर्बाद जान गया हूँ असली हँसी की क़ीमत जान गया हूँ ऐ ज़िन्दगी तेरी हक़ीक़त ख़ाली बैठ कर बस यही सोचता हूँ मैं क्या ग्यारह बरसों से मर रहा हूँ मैं?
Kabir Altamash
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"मुझ को लगता है" मुझ को लगता है कि तुम्हारा फ़ोन आएगा बहुत रोओगी मुझ पर बहुत चिल्लाओगी तुम बहुत बातें होंगी फिर से और ये पूछोगी तुम कब तक करूँँ मैं कॉल पर बातें कब तक तुम को वीडियो कॉल पर देखूं ये बताओ मुझ को कि मिलने कब आओगे तुम? मुझ को लगता है कि तुम्हारा मैसेज आएगा आई मिस यूँ का एक मुझ को टेक्स्ट आएगा मुझ सेे मेरी एक पिक माँगोगी और देख कर फोटो झट से चूम लोगी तुम फिर ये पूछोगी मुझ सेे कि मिलने कब आओगे तुम? मैं ये जानता हूँ लेकिन अब किसी और की हो तुम मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा फ़ोन आएगा मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा मैसेज आएगा
Kabir Altamash
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