"लौट कर मत आना" हो किस्मत में तुम नहीं मेरे है हक़ीक़त भी तुम नहीं मेरे मगर है ये सच भी कि तुम्हें छोड़ नहीं सकता मैं ख़ुद का ही दिल तोड़ नहीं सकता चलो एक एहसान करो मुझ पे तुम ख़ुद ही दूर हो जाओ मुझ सेे करो वा'दा ये मुझ सेे कि मुझे तुम भूल जाओगे हँसोगे मेरे बिन भी कि एक दिन दूर जाओगे बहुत आएगी याद मेरी है क़सम तुझे मेरी तुम लौट कर मत आना तुम लौट कर मत आना
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"बेकार फूल" हम हैं किसी दरख़्त का सब सेे पहला सब सेे बेकार फूल हम ने झेले हैं रौशनी के नाम पर कई अज़ाब हम ने देखा है ख़ुद को इक टहनी से टूटते हुए हम ने देखा है क़िस्मत को रूठते हुए हमें कहाँ नसीब के कोई दुख हमारा देखे और देखे तो कोई क्यूँ ख़ुदारा देखे किसी दिन हमें भी इक लड़की को सौंप दिया जाएगा किसी दिन हम भी मुरझा जाएँगे किसी दिन वो लड़की भी किताब में रख कर हम को भूल जाएगी किसी दिन हम भी सूख जाएँगे
Kabir Altamash
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" दोस्त " दोस्त तुम मुझ को भूल गए हो ना दोस्त कहीं ऐसा न हो मैं मर जाऊँ और तब तुम को ख़याल आए कि एक तुम्हारा दोस्त था वही जिस का बस एक तुम्हीं दोस्त थे दोस्त हो दोस्त तुम्हारे साथ मैं ख़ुश रहता था दोस्त अब मैं ख़ुश नहीं हूँ मेरे साथ बहुत कुछ बुरा हुआ इन दिनों मेरा सब कुछ मुझ सेे जुदा हुआ इन दिनों सब कुछ में सब कुछ एक तुम ही तो थे दोस्त दोस्त मैं जानता हूँ तुम्हें एक न एक दिन एहसास होगा मगर कहीं ऐसा न हो तब तक बहुत देर हो जाए दोस्त कहीं ऐसा न हो तुम को मैं बेजान लेटा हुआ दिखूँ ख़ैर फिर भी रोना नहीं मेरे मरने पर ये भी मत सोचना कि तुम ने मुझे फिर से खो दिया है दोस्त तुम महसूस करना कि मैं अब भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी रहा हूँ दोस्त तुम महसूस करना तुम्हारे साथ बाइक पर बैठा हुआ हूँ दोस्त तुम महसूस ये भी करना मैं तुम्हें गालियां दे रहा हूँ
Kabir Altamash
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"मुझ को लगता है" मुझ को लगता है कि तुम्हारा फ़ोन आएगा बहुत रोओगी मुझ पर बहुत चिल्लाओगी तुम बहुत बातें होंगी फिर से और ये पूछोगी तुम कब तक करूँँ मैं कॉल पर बातें कब तक तुम को वीडियो कॉल पर देखूं ये बताओ मुझ को कि मिलने कब आओगे तुम? मुझ को लगता है कि तुम्हारा मैसेज आएगा आई मिस यूँ का एक मुझ को टेक्स्ट आएगा मुझ सेे मेरी एक पिक माँगोगी और देख कर फोटो झट से चूम लोगी तुम फिर ये पूछोगी मुझ सेे कि मिलने कब आओगे तुम? मैं ये जानता हूँ लेकिन अब किसी और की हो तुम मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा फ़ोन आएगा मुझ को फिर भी लगता है तुम्हारा मैसेज आएगा
Kabir Altamash
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"ग्यारह बरस" यूँँ उदास रहते रहते ग्यारह बरस बीतने को हैं इन ग्यारह बरसों ने मुझे तोड़ कर रख दिया हाँ ये भी है कि बहुत कुछ सीख गया हूँ कि कैसे हँसते हैं ना चाहते हुए भी और कैसे रोकते हैं उन आँसुओं को जो बहना चाहते हों सिगरेट के सहारे कैसे करते हैं मौत को और क़रीब कैसे जीते हैं मौत को कैसे करते हैं ख़ुद को उदास कैसे होते हैं ख़ुद ही सब सेे दूर कैसे रहते हैं बस ख़ुद ही के पास कैसे करते हैं भूले हुओं को याद कैसे करते हैं ख़ुद को बर्बाद जान गया हूँ असली हँसी की क़ीमत जान गया हूँ ऐ ज़िन्दगी तेरी हक़ीक़त ख़ाली बैठ कर बस यही सोचता हूँ मैं क्या ग्यारह बरसों से मर रहा हूँ मैं?
Kabir Altamash
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"शाइ'र" उस सेे कहना कि रोए नहीं उस सेे कहना कि रोने से भी वो वापस नहीं आएगा उस सेे कहना कि रोना ठीक नहीं उस सेे कहना कि तुम हंसती हुई अच्छी लगती हो उस को समझाना सब कुछ ठीक है कुछ नहीं बिगड़ा उस को कहना कि वो अब भी तुम्हारे साथ है, तुम्हारे पास है उस को ये बताना कि उस की सारी ग़ज़लें तुम्हारी दी हुई हैं और उस को बताना कि तुम उस की सब सेे ख़ूब-सूरत ग़ज़ल हो उस सेे कहना कि वो तुम्हारा कोई भी वा'दा निभा नहीं सका उस सेे कहना कि ख़ुदा ने उसे वक़्त कम दिया उस सेे कहना कि वो इतनी जल्दी जाना नहीं चाहता था उस को ये बार बार मत कहना कि वो लड़का अब मर चुका है उस सेे कहना कि वो शाइ'र था और शाइ'र कभी नहीं मरता
Kabir Altamash
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