nazmKuch Alfaaz

"मुझे लगता है कि तुम हो" कहीं पे चाँद आ चमके मुझे लगता है कि तुम हो कहीं पे तारे जब दमके मुझे लगता है कि तुम हो कहीं बारिश की घटा हो कहीं गुम-सुम सी फ़ज़ा हो कहीं आँखों का मिलन हो कहीं रुख़सार की वाह हो कोई फ़ुर्क़त से मिला हो वो नज़र कैसी हो क्या हो मुझे लगता है कि तुम हो मेरे आँगन के किनारे कहीं एक फूल जब महके मेरी हर रात जिस की याद में आरज़ू कह के कहीं हो ख़ुर सा रौशन कहीं वो अक्स-ए-हिना हो मुझे लगता है कि तुम हो तुम्हारें नाम का हमनाम कहीं कुछ देर ठहरा हो तुम्हारी तरह कोई शख़्स किसी कोने में बैठा हो कहीं आँखों में पानी हो कहीं दरिया भी सूखा हो कहीं फूलों के गुलशन में कोई चिड़िया सा चहका हो किसी गुम-नाम से रस्ते कोई आवाज़ बुलवाएँ किसी दोशीज़ा की ख़ुशबू मुलाक़ात मुझ से करवाएँ किसी शब में किसी दिन के तअल्लुक़ मुझ से हो जाए कहीं दिलकश लबों से फिर कोई दो बात सुलझाएँ कहीं आँचल में हो पहलू कहीं पैरों में पायल हो मुझे लगता है कि तुम हो कहाँ ये बात तुम सेे हो कहाँ ये रात तुम सेे हो कहाँ सोहेल भी चाहे कि मुलाक़ात तुम सेे हो कहाँ हो सोहेल की नज़्में कहाँ है उन का माह-चेहरा कि जैसे एक तिल बैठा दिए रुख़सार पर पहरा करम हो 'सोहेल' ख़स्ता पर कि मैं हूँ अदना सा शाइ'र मगर जब शे'र सुन कर कोई मुझ पर, दाद देता हो मुझे लगता है कि तुम हो

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"अजब नहीं है" अजब नहीं हैं कि बिन तुम्हारे वो लफ्ज़ सारे जो मेरे पन्नों पे सो रहे हैं कि जैसे चेहरे को तुम ने फेरा ऐसे करवट बदल रहे हैं अजब नहीं हैं वो शे'र सारे जो थे हमारे हमारी भीगी क़लम में ऐसे समा गए हैं कि जैसे हद्द से गुज़र रहे हो ये कोरे पन्नों पे बह रहे हो अजब नहीं हैं कहा था तुम ने कि सोहेल सुन लो बता रही हूँ जो मेरे मुह से टपक रहा है वो ख़ून ए दिल की ही आदतें हैं ये सब तुम्हारी इनायतें हैं ये सारी मेरी शिकायतें हैं ये जोश-ए-ख़ून-ए-नदामतें हैं इसीलिए मैं ख़फ़ा हूँ तुम से इसीलिए मैं ये कह रही हूँ कि जो भी नज़्में लिखे हो तुम ने तुम्हारी नज़्में नहीं पढ़ूँगी अजब नहीं हैं जो खूँ थूकन में तुम्हारा ख़ून-ए-जिगर बहा था वो ही तो ख़ून-ए-जिगर को मैं ने मेरी इन आँखों पे जब मला था अभी भी लगता हैं जैसे आँखें वो ताज़ा खूँ फिर बहा रही हो अभी भी लगता हैं जैसे लब पर ख़फ़ा ख़फ़ा सी अदा रही हो लहू थूकन की जो थी अदाएं हर एक बूँदों में थी वफ़ाएँ मगर वफ़ाओं से क्या हुआ हैं मगर अदाओं से क्या हुआ हैं सुनो मगर अब हुआ तुम्हारा कहूँ क्या मैं कुछ वो बात क्या थी कि नज़्म मेरी नहीं पढ़ोगी अगर ये सच है तो फिर ये सुन लो कि लग रहा है तुम पढ़ रही हो तड़प रही हो सुलग रही हो सिमट रही हो मगर अब मैं ने तो बा'द मुद्दत के नज़्म लिक्खा हूँ जैसे तैसे कहीं किसी दिन तुम्हारे ख़्वाबों में नज़्म गाऊँ तो ये मत कहना मुझे नहीं कोई नज़्म सुनना तुम अपनी नज़्में भी ले कर जाओ तुम अपनी ग़ज़लें भी ले कर जाओ अगर मुझे भूल जाना चाहो तो सारी क़स में भी ले कर जाओ अजब नहीं हैं ये सारी क़स में ये सारी नज़्में ये सारी ग़ज़लें जो मैं ने पन्नों पर है उतारा ये पन्ने चाहे कि देखे तुम को कि तुम में ऐसी भी क्या कशिश हैं ये पन्ने चाहे पता लगाना कि कौन हो तुम जो इतने दिलकश है लब तुम्हारे बताओ भी क्या है नाम तुम्हारा इन्हें बता दूँ अगर तो फिर ये दीवाने पागल ना जी सकेंगे इन्हें बताना नहीं मुनासिब ये बे-ख़बर हो तभी सही है कि नाम भी अब कहीं नहीं है अजब नहीं हैं वो भीगे पन्नों पे ना लिखा था जो नाम अब तक वो नाम अब मैं छुपा छुपा कर रखूँगा कब तक मुझे ये लगता है कि अब तो तुम्हारा वक़्त भी गुज़र चुका है ये पानी सर से उतर चुका है ना कोई ख़्वाहिश कि तुम अब आओ ना कोई हसरत ना आरज़ू हैं ना कोई हिम्मत बची हैं हम में ना कोई साथी ना गुफ़्तगू हैं अजब नहीं हैं ये नज़्म कह दे जो कुछ भी लिक्खा है, बस भी कर दो लिखोगे कितना बताओ सोहेल अब तुम ही बोलो मैं क्या बताऊँ ये मेरी बातों से बे-ख़बर हैं ये मेरे लफ़्ज़ों का ही असर हैं अजब नहीं हैं मगर ये सुन लो बता रहा हूँ जो मेरे लफ़्ज़ों से मो'अतबर थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे

Shaikh Sohail

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