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“नैरंतर्य” मृत्यु शय्या दिख रही हो फिर भी न होना विकल जिस मार्ग पर तुम चल दिए उस मार्ग पर रहना अटल क्या पराजय ? क्या विजय ? ये सीढ़ियाँ हैं सीढ़ियाँ जो मिले स्वीकार कर बढ़ता ही चल बढ़ता ही चल उस धार का कर अनुसरण और मध्य में गोते भी खा उस खग नयन को भेद दे होगा सफल होगा सफल

Aqib khan1 Likes

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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नज़्म: कामयाब साज़िश था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को यूँँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ नई बारिशों ने की साज़िश नई गिराना है इस को तो हर एक सूरत चलो साथ मिल कर के हमला करें मगर याद रखना, जो हमला है करना हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो धराशाही होकर किधर जाएगा वो ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा ये दावा किया और लगे काम पर सब उधर उस मकाँ को न मालूम था ये वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद वही फिर हुआ जो कि होता है सच में पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का

Aqib khan

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“तमाशा “ अब बने हो कठपुतली तो तुम्हें समझ आया हर तरफ़ निराशा है ज़िंदगी तमाशा है पहली बार उतरें तो हम सभी को लगता है खेल ये नया सा है वक़्त रहते जानोगे तुम नए हो मैदाँ में खेल ये पुराना है ये कोई खुलासा है ज़िंदगी तमाशा है बात ये पुरानी है हर किसी ने जानी है ज़िंदगी तमाशा है ज़िंदगी तमाशा है

Aqib khan

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"तुम नहीं जानते" मन को बहलाया पागल नहीं मानता क्या है अपना पराया नहीं जानता है ये पागल जो आँखों के फंदे पड़ा और फिर बे-हया डूबता ही गया डूबा ऐसे कि जैसे मिली ज़िंदगी ये नहीं जानता है हसीं मौत ही और फिर ऐसे रस्ते पे ला कर खड़ा कर दिया इसने मुझ को सो कहता हूँ अब किस तरह कट रहा है ये बेजाँ सफ़र जिस को पाया नहीं उस को खोने का डर तुम नहीं जानते तुम नहीं जानते ऐ मेरे दोस्ताँ तुम नहीं जानते

Aqib khan

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“तुम नइँ समझे” मुश्किल को आसान बनाया जा सकता था जा सकता था दुनिया छोड़ के भी तो जाया जा सकता था पागल हो क्या ख़ुद से इतनी नफरत क्यूँ करते हो प्यार ख़ुद से नफरत क्या जुमला है जुमलेबाज़ी पर जीना आसान नहीं पर अच्छा तो अब ठान चुके हो पागलपन में ही जीना है पागल होना मेरे बस की बात नहीं है ख़ुद में खोना मेरे बस की बात नहीं है कुछ तो अच्छा बोला तुम ने शुक्र है मौला नइँ तुम नइँ समझे अच्छा होना मेरे बस की बात नहीं है

Aqib khan

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“अँधेरा” जाने किस की तलाश में थे हम जाने किस रास्ते को जाते थे हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे सोचते थे कि रौशनी होगी ये अँधेरा भला है कब तक का फिर कहीं ये पता चला हम को चाँद जो जगमगाता दिखता है बात सच है मगर है आधी सच चाँद के पीछे बस अँधेरा है वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं वो अँधेरा जो है सदा के लिए और वहाँ रौशनी की उम्मीदें बस ख़यालों में पूरी होती हैं हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी जिस का मिलना था यारों नामुमकिन जब तलक जान पाए ये आक़िब पीछे जाने का हौसला न रहा आगे बढ़ना भी अब है बेमानी अब भटकते हैं बस अँधेरे में और बस इंतिज़ार करते हैं उस कहानी के ख़त्म होने का जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं या ये मुझ को सियाह दिखते हैं

Aqib khan

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