नज़्म: कामयाब साज़िश था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को यूँँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ नई बारिशों ने की साज़िश नई गिराना है इस को तो हर एक सूरत चलो साथ मिल कर के हमला करें मगर याद रखना, जो हमला है करना हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो धराशाही होकर किधर जाएगा वो ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा ये दावा किया और लगे काम पर सब उधर उस मकाँ को न मालूम था ये वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद वही फिर हुआ जो कि होता है सच में पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Allama Iqbal
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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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“अँधेरा” जाने किस की तलाश में थे हम जाने किस रास्ते को जाते थे हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे सोचते थे कि रौशनी होगी ये अँधेरा भला है कब तक का फिर कहीं ये पता चला हम को चाँद जो जगमगाता दिखता है बात सच है मगर है आधी सच चाँद के पीछे बस अँधेरा है वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं वो अँधेरा जो है सदा के लिए और वहाँ रौशनी की उम्मीदें बस ख़यालों में पूरी होती हैं हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी जिस का मिलना था यारों नामुमकिन जब तलक जान पाए ये आक़िब पीछे जाने का हौसला न रहा आगे बढ़ना भी अब है बेमानी अब भटकते हैं बस अँधेरे में और बस इंतिज़ार करते हैं उस कहानी के ख़त्म होने का जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं या ये मुझ को सियाह दिखते हैं
Aqib khan
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"तुम नहीं जानते" मन को बहलाया पागल नहीं मानता क्या है अपना पराया नहीं जानता है ये पागल जो आँखों के फंदे पड़ा और फिर बे-हया डूबता ही गया डूबा ऐसे कि जैसे मिली ज़िंदगी ये नहीं जानता है हसीं मौत ही और फिर ऐसे रस्ते पे ला कर खड़ा कर दिया इसने मुझ को सो कहता हूँ अब किस तरह कट रहा है ये बेजाँ सफ़र जिस को पाया नहीं उस को खोने का डर तुम नहीं जानते तुम नहीं जानते ऐ मेरे दोस्ताँ तुम नहीं जानते
Aqib khan
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"वापसी मुश्किल है" अब कहाँ पर पहुँच गए हो दोस्त तुम तो रस्ता भटक गए हो दोस्त कितने चौकन्ने हो के निकले थे फिर भला क्यूँँ बहक गए हो दोस्त कुछ तो सोचो कहाँ पे जाना है जो भी चाहा है कैसे पाना है कुछ तो बोलो कि अब करोगे क्या या फ़क़त वक़्त ही बिताना है जाने कितनों की आस हो तुम तो यूँँ न हो आस उन की मर जाए बे-सबब होगा जीतना तब तो मन अगर उन का तुम सेे भर जाए अब भी मौका है तुम ठहर जाओ इस सेे पहले कि यूँँ ही मर जाओ ठहरो! सोचो कहाँ पे जाना है कुछ न रस्ता दिखे तो घर जाओ घर का रस्ता मैं जानता हूँ मगर क्या कहूँगा गया मैं ऐसे अगर उन की आँखें सवाल पूछेंगी उन की आँखें सवाल पूछेंगी
Aqib khan
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“तमाशा “ अब बने हो कठपुतली तो तुम्हें समझ आया हर तरफ़ निराशा है ज़िंदगी तमाशा है पहली बार उतरें तो हम सभी को लगता है खेल ये नया सा है वक़्त रहते जानोगे तुम नए हो मैदाँ में खेल ये पुराना है ये कोई खुलासा है ज़िंदगी तमाशा है बात ये पुरानी है हर किसी ने जानी है ज़िंदगी तमाशा है ज़िंदगी तमाशा है
Aqib khan
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“नैरंतर्य” मृत्यु शय्या दिख रही हो फिर भी न होना विकल जिस मार्ग पर तुम चल दिए उस मार्ग पर रहना अटल क्या पराजय ? क्या विजय ? ये सीढ़ियाँ हैं सीढ़ियाँ जो मिले स्वीकार कर बढ़ता ही चल बढ़ता ही चल उस धार का कर अनुसरण और मध्य में गोते भी खा उस खग नयन को भेद दे होगा सफल होगा सफल
Aqib khan
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