nazmKuch Alfaaz

"वापसी मुश्किल है" अब कहाँ पर पहुँच गए हो दोस्त तुम तो रस्ता भटक गए हो दोस्त कितने चौकन्ने हो के निकले थे फिर भला क्यूँँ बहक गए हो दोस्त कुछ तो सोचो कहाँ पे जाना है जो भी चाहा है कैसे पाना है कुछ तो बोलो कि अब करोगे क्या या फ़क़त वक़्त ही बिताना है जाने कितनों की आस हो तुम तो यूँँ न हो आस उन की मर जाए बे-सबब होगा जीतना तब तो मन अगर उन का तुम सेे भर जाए अब भी मौका है तुम ठहर जाओ इस सेे पहले कि यूँँ ही मर जाओ ठहरो! सोचो कहाँ पे जाना है कुछ न रस्ता दिखे तो घर जाओ घर का रस्ता मैं जानता हूँ मगर क्या कहूँगा गया मैं ऐसे अगर उन की आँखें सवाल पूछेंगी उन की आँखें सवाल पूछेंगी

Aqib khan0 Likes

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.

Gulzar

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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नज़्म: कामयाब साज़िश था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को यूँँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ नई बारिशों ने की साज़िश नई गिराना है इस को तो हर एक सूरत चलो साथ मिल कर के हमला करें मगर याद रखना, जो हमला है करना हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो धराशाही होकर किधर जाएगा वो ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा ये दावा किया और लगे काम पर सब उधर उस मकाँ को न मालूम था ये वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद वही फिर हुआ जो कि होता है सच में पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का

Aqib khan

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"तुम नहीं जानते" मन को बहलाया पागल नहीं मानता क्या है अपना पराया नहीं जानता है ये पागल जो आँखों के फंदे पड़ा और फिर बे-हया डूबता ही गया डूबा ऐसे कि जैसे मिली ज़िंदगी ये नहीं जानता है हसीं मौत ही और फिर ऐसे रस्ते पे ला कर खड़ा कर दिया इसने मुझ को सो कहता हूँ अब किस तरह कट रहा है ये बेजाँ सफ़र जिस को पाया नहीं उस को खोने का डर तुम नहीं जानते तुम नहीं जानते ऐ मेरे दोस्ताँ तुम नहीं जानते

Aqib khan

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“तमाशा “ अब बने हो कठपुतली तो तुम्हें समझ आया हर तरफ़ निराशा है ज़िंदगी तमाशा है पहली बार उतरें तो हम सभी को लगता है खेल ये नया सा है वक़्त रहते जानोगे तुम नए हो मैदाँ में खेल ये पुराना है ये कोई खुलासा है ज़िंदगी तमाशा है बात ये पुरानी है हर किसी ने जानी है ज़िंदगी तमाशा है ज़िंदगी तमाशा है

Aqib khan

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“अँधेरा” जाने किस की तलाश में थे हम जाने किस रास्ते को जाते थे हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे सोचते थे कि रौशनी होगी ये अँधेरा भला है कब तक का फिर कहीं ये पता चला हम को चाँद जो जगमगाता दिखता है बात सच है मगर है आधी सच चाँद के पीछे बस अँधेरा है वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं वो अँधेरा जो है सदा के लिए और वहाँ रौशनी की उम्मीदें बस ख़यालों में पूरी होती हैं हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी जिस का मिलना था यारों नामुमकिन जब तलक जान पाए ये आक़िब पीछे जाने का हौसला न रहा आगे बढ़ना भी अब है बेमानी अब भटकते हैं बस अँधेरे में और बस इंतिज़ार करते हैं उस कहानी के ख़त्म होने का जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं या ये मुझ को सियाह दिखते हैं

Aqib khan

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“तुम नइँ समझे” मुश्किल को आसान बनाया जा सकता था जा सकता था दुनिया छोड़ के भी तो जाया जा सकता था पागल हो क्या ख़ुद से इतनी नफरत क्यूँ करते हो प्यार ख़ुद से नफरत क्या जुमला है जुमलेबाज़ी पर जीना आसान नहीं पर अच्छा तो अब ठान चुके हो पागलपन में ही जीना है पागल होना मेरे बस की बात नहीं है ख़ुद में खोना मेरे बस की बात नहीं है कुछ तो अच्छा बोला तुम ने शुक्र है मौला नइँ तुम नइँ समझे अच्छा होना मेरे बस की बात नहीं है

Aqib khan

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