“तमाशा “ अब बने हो कठपुतली तो तुम्हें समझ आया हर तरफ़ निराशा है ज़िंदगी तमाशा है पहली बार उतरें तो हम सभी को लगता है खेल ये नया सा है वक़्त रहते जानोगे तुम नए हो मैदाँ में खेल ये पुराना है ये कोई खुलासा है ज़िंदगी तमाशा है बात ये पुरानी है हर किसी ने जानी है ज़िंदगी तमाशा है ज़िंदगी तमाशा है
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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नज़्म: कामयाब साज़िश था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को यूँँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ नई बारिशों ने की साज़िश नई गिराना है इस को तो हर एक सूरत चलो साथ मिल कर के हमला करें मगर याद रखना, जो हमला है करना हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो धराशाही होकर किधर जाएगा वो ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा ये दावा किया और लगे काम पर सब उधर उस मकाँ को न मालूम था ये वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद वही फिर हुआ जो कि होता है सच में पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का
Aqib khan
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"तुम नहीं जानते" मन को बहलाया पागल नहीं मानता क्या है अपना पराया नहीं जानता है ये पागल जो आँखों के फंदे पड़ा और फिर बे-हया डूबता ही गया डूबा ऐसे कि जैसे मिली ज़िंदगी ये नहीं जानता है हसीं मौत ही और फिर ऐसे रस्ते पे ला कर खड़ा कर दिया इसने मुझ को सो कहता हूँ अब किस तरह कट रहा है ये बेजाँ सफ़र जिस को पाया नहीं उस को खोने का डर तुम नहीं जानते तुम नहीं जानते ऐ मेरे दोस्ताँ तुम नहीं जानते
Aqib khan
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“अँधेरा” जाने किस की तलाश में थे हम जाने किस रास्ते को जाते थे हर तरफ़ हर जगह अँधेरा था थोड़े जुगनू से टिमटिमाते थे सोचते थे कि रौशनी होगी ये अँधेरा भला है कब तक का फिर कहीं ये पता चला हम को चाँद जो जगमगाता दिखता है बात सच है मगर है आधी सच चाँद के पीछे बस अँधेरा है वो अँधेरा जो ख़त्म होता नहीं वो अँधेरा जो है सदा के लिए और वहाँ रौशनी की उम्मीदें बस ख़यालों में पूरी होती हैं हम भी ऐसे ही रास्ते पे थे जिस की मंज़िल फ़क़त ख़याली थी जिस का मिलना था यारों नामुमकिन जब तलक जान पाए ये आक़िब पीछे जाने का हौसला न रहा आगे बढ़ना भी अब है बेमानी अब भटकते हैं बस अँधेरे में और बस इंतिज़ार करते हैं उस कहानी के ख़त्म होने का जिस के पन्नों पे कुछ लिखा ही नहीं क्या ये पन्ने सफ़ेद पन्ने नहीं क्या ये पन्ने सियाह पन्ने हैं या ये मुझ को सियाह दिखते हैं
Aqib khan
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“तुम नइँ समझे” मुश्किल को आसान बनाया जा सकता था जा सकता था दुनिया छोड़ के भी तो जाया जा सकता था पागल हो क्या ख़ुद से इतनी नफरत क्यूँ करते हो प्यार ख़ुद से नफरत क्या जुमला है जुमलेबाज़ी पर जीना आसान नहीं पर अच्छा तो अब ठान चुके हो पागलपन में ही जीना है पागल होना मेरे बस की बात नहीं है ख़ुद में खोना मेरे बस की बात नहीं है कुछ तो अच्छा बोला तुम ने शुक्र है मौला नइँ तुम नइँ समझे अच्छा होना मेरे बस की बात नहीं है
Aqib khan
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"वापसी मुश्किल है" अब कहाँ पर पहुँच गए हो दोस्त तुम तो रस्ता भटक गए हो दोस्त कितने चौकन्ने हो के निकले थे फिर भला क्यूँँ बहक गए हो दोस्त कुछ तो सोचो कहाँ पे जाना है जो भी चाहा है कैसे पाना है कुछ तो बोलो कि अब करोगे क्या या फ़क़त वक़्त ही बिताना है जाने कितनों की आस हो तुम तो यूँँ न हो आस उन की मर जाए बे-सबब होगा जीतना तब तो मन अगर उन का तुम सेे भर जाए अब भी मौका है तुम ठहर जाओ इस सेे पहले कि यूँँ ही मर जाओ ठहरो! सोचो कहाँ पे जाना है कुछ न रस्ता दिखे तो घर जाओ घर का रस्ता मैं जानता हूँ मगर क्या कहूँगा गया मैं ऐसे अगर उन की आँखें सवाल पूछेंगी उन की आँखें सवाल पूछेंगी
Aqib khan
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