दिल तेरा इक आईना है आईने से डरना अपने जैसी सूरत देख के यूँँही न उस पे मरना सूरत तो सपना है मूरख एक झलक दिखलाए दुख-सुख इक लम्हे की छाया आए भी और जाए तू क्यूँ इक लम्हे की ख़ातिर अपना मान गँवाए दिल तेरा इक आईना है आईने से डरना अपने आप न मरना
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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करम योगी है पैकर-ए-जिस्म में रहता है मिरे साथ उस की आवाज़ मिरे दिल से निकल कर फूँकती है मिरी रूह में नग़्मों का ख़ुमार फूल खिलते हैं सितारों के मिरे आँगन में मेरी सखियाँ मेरी हमजोलियाँ आती हैं मुझे मिलने तो वो मिल बैठता है उस की आसूदगी-ए-दिल दर-ओ-दीवार से बाहर किसी महकी हुई ख़ुशबू की तरह फैलती है फैल कर चूमती है हर कस-ओ-ना-कस के क़दम क्या करूँँ दिल मिरा दीवाना है पैकर-ए-जिस्म में रहता हुआ योगी है वफ़ा की तस्वीर अपनी ता'बीर को ख़्वाबों में बसा लेती हूँ कोई आज़ुर्दा-बदन कोई ख़िज़ाँ-दीदा चमन उस की फैली हुई ख़ुशबू से अगर जाग उठे तो मुझे ग़म होता है
Ghalib Ahmad
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दरख़्तों से पत्ते तो हर साल गिरते हैं मिट्टी में मिलने की ख़्वाहिश लिए मगर उन को गिन गिन के रखता है कौन सफ़र की थकन से सरासीमा पत्ता जो गिरता है लम्हे की दीवार कर के उबूर बहुत दूर से आ के लेता है मिट्टी की ख़ुशबू की ख़ुशियाँ मगर ज़र्द रंगों के ज़ेवर से आरास्ता ये ख़िज़ाँ की दुल्हन जिस की क़िस्मत के तारे शब-ओ-रोज़ गिरते हैं धरती की आग़ोश पर हैं ये किस के इशारे इन्ही ज़र्द रंगों की ख़ुशबू में शायद नई ख़्वाहिशों के उफ़ुक़ हैं नए चाँद तारे
Ghalib Ahmad
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चश्म-ए-तमन्ना जिसे नींद आई थी सदियों की बीमारियों की थकन से जाग उट्ठी है शायद बदन में नया दिन शगूफ़े की मानिंद उभरा शफ़क़-ज़ार बन कर दिल की आग़ोश में आ बसा है नज़ारे में मसहूर रहने की ख़्वाहिश जनम ले रही है बसा कर उसे अपनी नज़रों में शादाब आँखों में रहने को जी चाहता है वही रंग-ओ-बू की हरारत की हल्की लकीरें तमाज़त के झोंके बदन छू रहे हैं बहार आ गई याद की वादियों में सफ़र के इरादों से मायूस कश्ती किनारे पे यूँँ आ लगी है कि ठहरी हुई झील की रौशनी में नया घर बसा है ये चश्म-ए-तमन्ना की कश्ती बनी है नया आशियाना नीलगूँ रौशनी तैरती है मगर ये खड़ी है ज़माने मोहब्बत के फिर लौट आए हैं शायद वक़्त के ठहर जाने की शायद घड़ी है क़यामत कड़ी है
Ghalib Ahmad
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रौशनी रौशनी रौशनी हर तरफ़ रौशनी से कहो छोड़ जाए मुझे वक़्त का कारवाँ जा रहा है मगर अभी साथ ले कर न जाए मुझे मिरी आरज़ू है कि तू भी कभी दिल की जानिब वो रस्ता सुझाए मुझे मिरी रौशनी को मिरे नूर को मेरी आँखों से ले कर दिखाए मुझे ज़ुल्मत-ओ-मौत की वादियों में कभी अँधेरों की ख़ातिर लुटाए मुझे रात का दूसरा रुख़ जो देखा नहीं चाँद की दूसरी सम्त भी है तिरी कभी उस से भी तो मिलाए मुझे ज़िंदगी ज़िंदगी ज़िंदगी हर तरफ़ ज़िंदगी से कहो छोड़ जाए मुझे
Ghalib Ahmad
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दोस्त रुख़्सत हो गए उन से मुलाक़ातें गईं बातें गईं शहर था आबाद जिन के दम-क़दम से वो हमारी चाँदनी रातें गईं मरने वाले मर गए ज़िंदा मगर हम भी नहीं वो तो ग़ुस्ल-ए-आख़िरी ले कर हुए फिर ताज़गी से आश्ना निथरे सुथरे ओढ़ कर अपनी सफ़ेदी के कफ़न काफ़ूर की ख़ुशबू को नथुनों में समाए सो गए आराम से ठंडे बदन अपनी अपनी क़ब्र पर तकिया किए वो थकन की इस मुसलसल सरसराहट से तो अब आज़ाद हैं साँस की ज़ंजीर से लटके हुए जागते रहने की काविश और लगन इस तग-ओ-दौ से परे आबाद हैं और हम जो इस किनारे पर खड़े रोज़-ओ-शब लहरों का करते हैं शुमार आप-बीती रोज़ सुनते हैं मगर ख़ामोश हैं ख़ामुशी से बहता पानी रोज़ बहता देखते हैं डूब जाने की मगर हिम्मत नहीं कौन जाने डूब ही जाएँ कहीं डूब जाओ या चले आओ इधर बाज़ आओ और फिर ज़िंदा रहो सातवाँ दर भी खुला है मुंतज़िर दाग़-ए-हिजरत दे गए ख़ुशबू के फूल कौन अब बन कर चराग़-ए-राह तुम को हाथ से उँगली पकड़ कर तिफ़्ल-ए-मकतब की तरह ले कर बढ़े और ये कहे मौत का लम्हा हमारी ज़िंदगी का आ गया जिस्म की ठंडक तो दस्तक दे रही है आओ कुछ बातें करें और फिर चलें दोस्त रुख़्सत हो गए
Ghalib Ahmad
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