nazmKuch Alfaaz

शहज़ादे ऐ मुल्क-ए-सुख़न के शहज़ादे देखो मैं ने नज़्म लिखी है नज़्म कि जैसे दिल का शहर शहर कि जिस में तुम रहते हो आधे हँस हँस बातें करते और आधे गुम-सुम रहते हो तुम्हें अधूरी बातें और अधूरी नज़्में अच्छी लगती हैं ना तुम कहते हो बात अधूरी मैं भी इक पूरापन होता है ख़ामोशी के कितने मा'नी होते हैं कुछ बातें अन-कही मुकम्मल शहज़ादे मैं नज़्म अधूरी लिख लाई हूँ तुम इस नज़्म को उनवाँ दे दो तुम ये नज़्म मुकम्मल कर दो लेकिन तुम इस गहरी चुप में क्या इस नज़्म को तुम अंजाम नहीं दोगे इस को नाम नहीं दोगे

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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आज तुम्हारे शहर से वापस लौट रही हूँ लेकिन कैसे साबित-ओ-सालिम कौन पलट कर जाता है किस दिल से आई थी मैं तुम से मिलना कैसा होगा जाने क्या कुछ मन में था तुम से मिलूँगी और तुम से मिलूँगी और बहुत सी बातें होंगी कुछ होंटों से बह निकलेंगी कुछ आँखें तहरीर करेंगी लेकिन ये सब ख़्वाब था मेरा देखो वापस लौट रही हूँ तारकोल की बल खाती ये साँपों जैसी सड़कें हर इक मोड़ तुम्हारी यादें और हवा में लम्स तुम्हारा भीगती आँखें ले कर वापस लौट रही हूँ लौट रही हूँ ख़ाली आँख और ख़ाली हाथ दूर उफ़ुक़ पर ज़र्द उदासी की चादर में लिपटा चाँद बिजली के तारों पर बैठे कुछ ख़ामोश परिंद इस चलती गाड़ी में जैसे मैं अफ़्सुर्दा-जाँ एक तरफ़ चिड़ियों का चम्बा पेड़ों पर वो शोर मचाता लेकिन जिस का दिल बुझ जाए उस को इन से क्या पोंछ रही हूँ भीगती आँखें इक इक कर के तेरी यादें आँचल के पल्लू में बाँध रही हूँ लेकिन गाँठ नहीं लगती है मेरी पोरें साथ नहीं हैं जैसे मेरे हाथ नहीं हैं

Janan Malik

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म्यूनिख़ में आज क्रिसमस है सारे मनाज़िर ने सफ़ेद चादर ओढ़ रखी है कमरे की खिड़की से आती उदासी चहार-सू फैलती जा रही है अँधेरा उदासियों के नौहे पढ़ रहा है मुमटियों से फिसलता नहीं कोई कंकर लम्हे साकित हो गए हैं अलमारी के ख़ानों में कुछ यादें बिखरी पड़ी हैं सामने पड़ी कुर्सी झूल रही है सारा माहौल सोगवार है अजीब सा डर है जो आँसू बन कर उतर रहा है आसमाँ सात रंग रौशनियाँ क़हक़हे साज़ नग़्मगी ये हुजूम साल-हा-साल की मसाफ़त है केंचुली बदलने का एहसास आँखों की ख़ामोशी से अथाह गहराई में उतर रहा है मैं अभी लौट कर नहीं आई दिल ने बरसों से रू-ए-आलम की ख़ाक छानी है तेरी अंखों में कहीं वो ज़माने सिमट के आ गए हैं जब कोएटा एयरपोर्ट से नम-नाकी ने तुम्हें रवाना किया रक़्स नग़्मगी चूड़ियों की खनक के नीचे हैं भारी है इन सब साज़ों से हाथ ख़ाली हैं दिल वीरान है दायरा दायरा ये ख़ामोशी दायरा दायरा ये तन्हाई जिस में क़दीम आसार मोहन-जोदाड़ो हड़प्पा बाबिल टेक्सला के जो मेरे अंदर लम्हा लम्हा उतरते जाते हैं मजीद अमजद मैं फ़ासलों की कमंद की असीर मैं तेरी शालात रूद-बार के पुल पर बड़ी देर से खड़ी हूँ

Janan Malik

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मैं रात थी सियाह रात एक नुक़्ते में सिमटी हुई आँख की पुतली जैसे नुक़्ते में मैं ने एक दिन को बाहर निकाला फिर उस दिन की बा-ईं पस्ली से ख़ुद बाहर निकली फिर मिरे अंदर कितने सूरज चाँद और सितारे अपनी अपनी मंज़िलें तय करने लगे मैं रात हूँ कभी न ख़त्म होने वाली रात मैं ने अपनी पोशाक का रंग पैदा किया फिर रंगों से रंग मिलते चले गए मैं रात हूँ मेरे एक बाज़ू पर सुब्ह और दूसरे पर शाम सो रहे हैं मेरी चादर के नीचे शहर क़ब्रिस्तानों की तरह पड़े हुए हैं अज़ानें एक दूसरे से टकरा कर गुम्बदों के आस-पास गिर जाती हैं लोग भिनभिनाती हुई मक्खियों की तरह जागते और सो जाते हैं ख़ुद अपना लहू गिराते और चाटते हैं समुंदर चीख़ते और दरिया रेंगते देखती रहती हूँ देखती रहती हूँ चुप-चाप उन का अंत जिन से फिर उन्हीं का जनम होगा अंत जो नए जन्म का बीज है ग़ुरूब जो तुलूअ'' के तश्त का ग़िलाफ़ है मैं रोने और हँसने से मावरा हूँ कभी कभी माँ की मोहब्बत में रोते हुए बच्चे की आवाज़ मुझे चौंका देती है

Janan Malik

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तुम्हें याद होगा तुम ने मुझे पिछले बरस ख़त में अप्रैल भेजा जो मुझ तक पहुँचते पहुँचते अगस्त हो गया लफ़्ज़ पीले पत्तों की तरह फ़र्श पर बिखर गए दिसम्बर की सर्द रातों में मैं वा'दों के आतिश-दान पर बैठी जागती रही मेरी रगों में जमा हुआ दिसम्बर आँखों से पिघल कर बहता रहता है इस बरस मुझे ख़त में कुछ नहीं भेजना कुछ भी नहीं शायद अज़िय्यतों से भरी शाख़ों पर किसी वा'दे की कोंपल फूट पड़े मौसमों का क्या है कब बदल जाएँ बे-ए'तिबार लहजों की तरह वक़्त सब कुछ उलट पलट रहा है शायद तुम्हारे लौटने तक बहुत कुछ वैसा न रहे जैसा तुम छोड़ गए थे लोहे के जबड़े मिट्टी के मल्बूस को तार-तार करते जा रहे हैं पुल जहाँ से तुम पार्क के किनारे खड़े दिखाई देते थे वो मंज़र मेट्रो बस ने निगल लिया है सुम्बुल के पेड़ों की जगह शॉपिंग मॉल ले चुका है और हाँ वो फूलों वाली दुकान जहाँ से हम बुके लेते थे वहाँ फास्टफूड बन गया दिल की जगह अंतड़ियों ने ले ली है क्या कुछ और कैसे बदल जाता है

Janan Malik

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कैसा अब्र है जिस के बरसने की हर पल उम्मीद लिए आँखें तिश्ना-लब रहती हैं इस को देख के ये किश्त-ए-बारानी भरती है ये जन्मों की प्यास हो जैसे इस मिट्टी की एक इक बूँद उतरती मुझ से बातें करती है पहले मैं बारिश को देख के ख़ुश होती थी अब मैं इस में भीग के इस की बातें सुनती हूँ

Janan Malik

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