नज़्में शे'र कहते कहते थक जाने पर नज़्मों की ओर लौटा जा सकता है इतिहास गवाह है कि नज़्मों ने हमेशा सहर्ष स्वीकारा है शाइरों को नज़् में सभी को देखती हैं एक सा इस लिए वो पाबंद भी होती हैं और आज़ाद भी पाबंदी और आज़ादी में तालमेल नज़् में ही बैठा सकी हैं अबतक हम नज़्मों से कितना कुछ सीख सकते हैं।
Related Nazm
जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
67 likes
"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
22 likes
हम दोनो घर चल देंगे हाथ पकड़ कर रख मेरा सर सीने पर रख मेरा यक़ीन तू कर, तू कहीं जाने वाला नहीं है वेंटिलेटर कम पड़ जाए तो क्या ? अपने हाथों को वेंटिलेटर, मैं बना दूँगा मैं तेरी सांसो की ख़ातिर सच में सनम मैं अपनी सांसे तक गिरवी रख दूँगा मैं रब से झगड़ा कर लूंगा पर कैसे भी मैं तुझ को जाने नहीं दूँगा तू घबरा मत सब कुछ ठीक हो जाएगा जैसे पहले था सब वैसा हो जाएगा तू रो मत इतनी सी तो बात है, और इतना कुछ तो हम ने साथ में झेला है और फिर इक दिन ये भी दुख चला जाएगा ऐसा समझो हम एक जंग में है ऐसा जानो हम जीतेंगे बस तू अपना हौसला मत जाने देना बाकी तो तू मुझ पर छोड़ दे सब कुछ मैं हूँ ना !! क्यूँ फिक्र तू करती है ? जैसे कट जाता है हर इक दिन वैसे ये दिन भी कट जाएगा ये अँधेरा धीरे-धीरे हट जाएगा फिर से सहर होगी हमनें कितना कुछ जीना है अभी तो अपना वेट भी करता होगा, घर अपना तेरी बातों में फिर से खोना है मुझे तेरे साथ अभी कितना हँसना है मुझे मैं ने तेरे हाथों का खाना फिर से खाना है तू टेंशन मत रख हम जल्दी ही घर चल देंगे तुझ को कुछ नहीं होगा बस कुछ दिन की बात है फिर हम दोनो घर चल देंगे
BR SUDHAKAR
10 likes
"तुम्हारी याद" तुम्हारी याद आते ही दिल को थाम लेता हूँ तुम्हें ही याद करता हूँ तुम्हारा नाम लेता हूँ तुम्हारी याद लाती है तबस्सुम मेरे चेहरे पर ख़यालों में संवरता हूँ निकल आते सुनहरे पर तुम्हारा याद आना ज़िन्दगी दुश्वार होना है तुम्हारी याद खो जाना मेरा बीमार होना है तुम्हारी याद आती है तो सब कुछ भूल जाता हूँ मैं जब कुछ भूल जाता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आती है तो आँखें बंद करता हूँ मैं आँखें बंद करता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आने से तुम्हारी याद जाने तक जो वक़्फा भी गुजऱता है तुम्हारी याद आती है
S M Afzal Imam
10 likes
"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता
Jaun Elia
13 likes
More from Adarsh Akshar
"प्रेम पत्र" वो उपन्यास जिस की कहानी कालजयी साबित हुई मुझे उतनी प्यारी नहीं ना ही मुझे प्यारी है वो किताब जिस ने ग़ज़ल नज़्म में फर्क समझाया उस ग्रंथ से भी उतना लगाव नहीं है जो माँ कहती थी अपने पास रखने के लिए दरअसल मुझे सब सेे प्रिय है वो एकमात्र प्रेम पत्र जो तुम ने अपनी सहेली के हाथों भेजवाया था और जिस के हर लाइन में वर्तनी की ग़लतियाँ थीं
Adarsh Akshar
2 likes
"वो कवि नहीं थे" मार काट के नारे लग रहे थे नारे लगाने वालों का चेहरा पोता हुआ था उन्हें रोक पाना मुश्किल था इंसानियत लहू-लुहान थी संवेदनाओं के चिथड़े उड़े हुए थे नफ़रत ने वातावरण का तापमान बढ़ा दिया था तभी पुलिस की गाड़ी आ धमकी सायरन सुन कर सभी भागने लगे पर मैं वहीं खड़ा रहा गाड़ी से उतर कर एक पुलिस अफ़सर मेरे सामने आया और उस ने मुझ सेे सवाल पूछा कि हिंसा करने वाले लोग कौन थे? मैं ने कहा हिंसा करने वाले लोग कवि नहीं थे
Adarsh Akshar
2 likes
"सुपरमैन" जब जब मैं अपनी ता'रीफ़ में किसी को बताता हूँ कि मैं एक सामान्य लड़का हूँ तो उस वक़्त मेरी आत्मा मुझ सेे सवाल करती है पूछती है कि क्यूँ मैं ने किसी को कहा कि मैं एक सामान्य लड़का हूँ ख़ुद को सामान्य बता कर मैं ने उस बच्चे को मार डाला जो अपनी कॉपी के पीछे बनाता था दुनिया की तस्वीर और ख़ुद को समझता था उस का रक्षक।
Adarsh Akshar
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Adarsh Akshar.
Similar Moods
More moods that pair well with Adarsh Akshar's nazm.







