“नज़रें” है रोटी पे भूखे फ़क़ीरों की नज़रें है रंजिश है साज़िश मिज़ाजों की नज़रें सफ़ेदी पे ख़ूनी लिबासों की नज़रें गुमानों गुनाहों ग़ुलामों की नज़रें है काले दिलो की ये काली सी नज़रें है गूंगी है बहरी है अंधी ये नज़रें है भूखी है नंगी है प्यासी ये नज़रें हाँ हैवान रातों की रानी ये नज़रें सताएँ हुओं की, हारी सी नज़रें है काले दिलो की ये काली सी नज़रें ये बनते बिगड़ते समाजों की नज़रें ये लाशों की ख़बरों पे चोरों की नज़रें छिपे आस्तीं में सपेरों की नज़रें ख़लाओं में रोती नवाओं की नज़रें है काले दिलो की ये काली सी नज़रें जवानी रवानी को ख़ूँ में बहाती भरोसे पे झूठी कटारे चलाती चुराती छिपाती ये ख़ुद को बचाती अनाओं से अपनी सभी को डराती है काले दिलो की ये काली सी नज़रें है सिक्कों कि खन-खन पे लोगों की नज़रें है पायल की छन-छन पे साज़ो की नज़रें हवस की है दामन पे चेहरों की नज़रें बुलाती है बेटों को माँओं की नज़रें है काले दिलो की ये काली सी नज़रें
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'हार नहीं मैं मानूँगा' महफ़िल हो तन्हाई हो कैसी भी रुसवाई हो या दुनिया हरजाई हो कोई क़यामत आई हो अंगारों में पलना हो या काँटों पर चलना हो पैरों में ज़ंजीर हो या चाहे जुदा तक़दीर हो या पीछे मुड़ के न देखूँगा पथ पर अपने निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे ग़म के मेले हों या घनघोर अँधेरे हों तूफ़ाँ हो या बिजली हो चाहे रात घनेरी हो चाहे दुनिया बैरी हो कोई भी मजबूरी हो चाहे बिजली गरजती हो तूफ़ानों की बारिश हो चाहे सूना आँगन हो अच्छा बुरा अब जो भी हो काम न कल पर टालूँगा मंजिल पर ही दम लूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे भाला ले कर आ तन पर ख़ंजर भी दौड़ा या राहों में गिरा कर जा जो चाहे वो कर के जा दुश्मन मेरी जान बने या घर कब्रिस्तान बने मौत मिरी मेहमान बने रोटी मेरी छीन ले तू पानी मेरा छीन ले तू मेरी भूख भी छीन ले तू मेरी प्यास भी छीन ले तू मेरा चैन भी छीन ले तू मेरी जान भी छीन ले तू मेरी नींद भी छीन ले तू हँसी-ख़ुशी सब दे दूँगा भूखे प्यासे रह लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा दुश्मन या घर वाले हों या फिर बाहर वाले हों राह में खाई खुदवाओ या शोलों पर चलवाओ चाहे आग में तड़पाओ चाहे कारावास मिले या मुझ को बन-बास मिले रूखी सूखी चटनी हो या ज़ेल का काला पानी हो चाहे आग के शो'ले हों चाहे दर्द की ज़ेलें हों थोड़ी देर को हँस लूँगा थोड़ी देर को रो लूँगा राज़ी ख़ुशी सब ले लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा सूली पर चढ़वा देना या काँटों पर चलवा लेना कितना भी तड़पा लेना तन पर कपड़े हों या न हों चाहे दुनिया हँसती हो पाँव में चप्पल हो या न हो या फिर पाँव में छाले हों कैसी भी अब हालत हो चाहे कोई गाली दे चाहे ज़हर की प्याली दे मैं चुप-चाप ही ले लूँगा मैं हर हाल में जी लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा मेरे जैसे जितने हैं बूढ़े हैं या बच्चे हैं बैरी हैं या अच्छे हैं साथ सभी को ले लूँगा हाथ में हाथ पकड़ लूँगा दर्द सभी के झेलूँगा साथ उन्हीं के हँस लूँगा साथ उन्हीं के रो लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा तेरी आस अधूरी हो चाहे प्यास अधूरी हो चाहे साँस अधूरी हो या रिश्तो में दूरी हो दुश्मन अब भगवान बने या कोई इंसान बने या कोई शैतान बने कोई मरे या कोई जिए चाहे ग़म का ज़हर पिए मुझ को नहीं है मतलब अब कितने भी जाल अब लगवाओ कितने भी शो'ले बरसाओ मुझ को काँटों पर ले जाओ कितने भी अब ज़ुल्म कराओ जान पे अपनी खेलूँगा मंज़िल पर ही दम लूँगा दुनिया को मैं जीतूँगा हार नहीं मैं मानूँगा
Prashant Kumar
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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"चाँदनी चौक की फ़ैक्टरी और मज़दूर" गिटर-पिटर यूँँ धूँ-धक्कड़ ये गुत्थम-गुत्थी चटर-पटर ये दंगल लाशें ज़ोर-जबर ये हड्डी घिस के चरर-परर... पट्ठे उठ जा तू ताल ठोक ये पसली में जा घुसी नोक ये खाँसी तगड़ी ज़ोरदार ये एसिड संग में कोलतार... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्क-बक्का...! ये पीठ है लकड़ी सख़त-सख़त ये सौ मन बोरी पटक-पटक ये काली-काली क्रीम जमा ये पॉलिश कर के खाए दमा... अरे उठ साले कि दिन चढ़ता फिर आई दुपहरी देख भरी ये खौं-खौं खाँसी रेत भरी... अजब दास्ताँ है लकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ये निकला बलग़म थूकों में इक रोटी है सौ भूखों में उस पे हैं क़र्ज़े लाख चढ़े ये सूद-ब्याज बिंदास बढ़े भट्ठी की चाँदनी चम-चम-चम इक हुआ फेफड़ा कम-कम-कम स्टील कटर से कटे हाथ तेज़ाब गटर नायाब साथ अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! ना ग्लास मास्क ना चश्मा भई लाशों के ढेर पे सपना भई सीलन घुटती अब सड़न-सड़न बदबू साँसें अरे व्हाट ए फ़न... फिर दिन टूटा फिर शाम बढ़ी फिर सूनी सुनसाँ रात चढ़ी ये बदन टूट पुर्ज़ा-पुर्ज़ा ये थकन कहे मर जा मर जा... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...! साले कुत्ते हर्रामी तू बदज़ात चोर है नामी तू तेज़ाब जलन पस फफ्फोले इक रात बिताने घर हो ले... भट्ठी की आग में मांस जला ये खाल खिंची और साँस जला ये पेट कटी आँतें बोलें आधी पूरी बातें बोलें... अजब दास्ताँ है लेकिन ये घिसती रातें पिसते दिन दिन का पहिया रात का चक्का रेशा-रेशा हक्का-बक्का...
Piyush Mishra
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दिल-आज़ारी भी इक फ़न है और कुछ लोग तो सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं चाहे उन का बुर्ज कोई हो अक़रब ही लगते हैं तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये अपनी यर्क़ानी सोचों से और भी ज़र्दी मलते रहते हैं माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते ऊपर से इस अमल को फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं जिस का पहला निशाना उमूमन बिल को अदा करने वाला साथी होता है! अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले ये नन्हे मेंडक हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं और जब फटने वाले हों तो हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं लेकिन ये वो साँप हैं जो कि अपने बच्चे ख़ुद ही चट कर जाते हैं कभी कभी मैं सोचती हूँ कि साँपों की ये ख़सलत मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में कैसी बे-पायाँ रहमत है!
Parveen Shakir
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''मशवरा'' तुम हम सेे मोहब्बत क्यूँ कर बैठी हो तुम्हें इल्म है हम किसी और से मोहब्बत करते हैं मगर तुम्हारे दिल में क्या आया कि तुम हम सेे मोहब्बत कर के बैठी हो देखो अब ये हमारा दिल किसी का नहीं हो सकता देखो तुम मासूम हो अभी कमसिन उम्र हो अभी तुम मोहब्बत के जाल में पड़ी नहीं हो अभी तुम्हारे ख़ुश रहने के दिन हैं मोहब्बत कर के तुम बर्बाद हो जाओगी याद बहुत करोगी लेकिन रोटी कम खाओगी फूल जैसे चेहरे को क्यूँ मुरझाना चाहती हो सच बताओ क्यूँ हमारे क़रीब आना चाहती हो हम किसी की फ़ुर्क़त में रोज़-ओ-शब रोते हैं धीरे धीरे उस की सारी यादों को धोते हैं तुम्हारे गेसू काली घटाएँ तुम्हारे लब और तुम्हारी अदाएँ अपने दिल को कैसे भी समझाओ जान-ए-मन तुम हम को भूल जाओ
Vaseem 'Haidar'
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