कौन आया है ये किस ने फूँक कर रखे क़दम दहलीज़ पर चुप-चाप चोरों की तरह रात की तारीकियों में सरसराहट साँप की साँस को सीने के अंदर रोक लो सुन न ले क़दमों की आहट दिल की धड़कन को कहो चुप साध ले दिल का दर वा तो न था पर वो तो दरवाज़े से अंदर आ गया उस ने दस्तक भी न दी एक साए की तरह है साथ साथ क्या करें किस को बुलाएँ क्या कहें ये कौन है चुप-चाप बे-आवाज़ गुम-सुम सामने बैठा हुआ यूँँ तो सब कुछ है अगर सोचो तो ये कुछ भी नहीं वहम-ओ-गुमाँ कौन अब ढूँडे उसे वो तो आ कर रात की तारीकियों में इस तरह घुल-मिल गया जैसे अपना जिस्म हो उस का लिबास हम ने देखा है उसे जो ख़ुद से भी रू-पोश है वो हमारी रूह की गर्दिश में है और हमारे जिस्म से सैराब है अब अगर तुम सो सको तो सो रहो अब वो जाएगा कहाँ अब वो शायद फिर न आएगा कभी
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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करम योगी है पैकर-ए-जिस्म में रहता है मिरे साथ उस की आवाज़ मिरे दिल से निकल कर फूँकती है मिरी रूह में नग़्मों का ख़ुमार फूल खिलते हैं सितारों के मिरे आँगन में मेरी सखियाँ मेरी हमजोलियाँ आती हैं मुझे मिलने तो वो मिल बैठता है उस की आसूदगी-ए-दिल दर-ओ-दीवार से बाहर किसी महकी हुई ख़ुशबू की तरह फैलती है फैल कर चूमती है हर कस-ओ-ना-कस के क़दम क्या करूँँ दिल मिरा दीवाना है पैकर-ए-जिस्म में रहता हुआ योगी है वफ़ा की तस्वीर अपनी ता'बीर को ख़्वाबों में बसा लेती हूँ कोई आज़ुर्दा-बदन कोई ख़िज़ाँ-दीदा चमन उस की फैली हुई ख़ुशबू से अगर जाग उठे तो मुझे ग़म होता है
Ghalib Ahmad
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1 हम किसी और सितारे से यहाँ आए थे याद रखना थी यही बात मगर भूल गए हम ने जब चाँद पे रक्खा था क़दम याद आया था हमें उस का बदन हम मगर अपनों की बातों में मगन वादी-ए-याद की गहराई में उतरे ही नहीं काश उस लम्हे की आवाज़ को हम सुन लेते फिर हमें वक़्त के चंगुल से रिहाई होती ग़ार के पार सफ़ेदी न सियाही होती 2 ज़मीं का ज़माना है ये हम ज़मीं-बोस हुए सब्ज़ रंगों के सराब नीलगूँ सत्ह-ए-आब हम फ़लक-बोस हुए और ये भूल गए थे कभी अपने बदन पर तेरे क़दमों के निशाँ सब्ज़ पत्तों के सिवा और भी रंग थे रंगों से सिवा कौन सा कैफ़ था इन चीज़ों में जिन की तुम रूह थे हम पैकर थे नूर हो साया हो कि तारीकी हो लाख मैं जिस्म से और रूह से आरास्ता पैरास्ता हो कर उठ्ठूँ बन भी जाए ये ज़मीं मेरी करिश्मा-गह-ए-आलात-गरी तू मगर और ही कुछ चीज़ है तू न नूरी है न नारी है न ख़ाक-ए-आबी तू न शमसी है न अर्ज़ी है न है महताबी तू न मिर्रीख़ से ज़ोहरा से न सरतान से है तेरे क़दमों के निशाँ और कहीं देखे थे जिस्म क़द शक्ल ये अतवार ये तेवर तेरे तेरी बू-बास लिबास फूल ये ज़ेवर तेरे ख़ामुशी तेरी ये आवाज़ ये चलना तेरा आना जाना ये सितारों का ग़ुबार सिलसिला है ये अदाओं का कि है जिस्म के पर्दों पे तेरी रूह के नग़्मों का ख़ुमार इक नई शान का हर रोज़ निखार और फिर सोचता हूँ तू तो कुछ और है इन चीज़ों का मजमूआ' नहीं तू तो कुछ और है इन से भी सिवा इन के होने का न होने का भी पाबंद नहीं तेरा वजूद तेरे क़दमों के निशाँ और कहीं देखे थे तेरे क़दमों से तो है आज भी शादाब मिरा सारा वजूद याद रखने की यही बात थी इब्न-ए-आदम तुम ने जब चाँद पे रक्खा था क़दम तुम किसी और सितारे से यहाँ आए थे
Ghalib Ahmad
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दरख़्तों से पत्ते तो हर साल गिरते हैं मिट्टी में मिलने की ख़्वाहिश लिए मगर उन को गिन गिन के रखता है कौन सफ़र की थकन से सरासीमा पत्ता जो गिरता है लम्हे की दीवार कर के उबूर बहुत दूर से आ के लेता है मिट्टी की ख़ुशबू की ख़ुशियाँ मगर ज़र्द रंगों के ज़ेवर से आरास्ता ये ख़िज़ाँ की दुल्हन जिस की क़िस्मत के तारे शब-ओ-रोज़ गिरते हैं धरती की आग़ोश पर हैं ये किस के इशारे इन्ही ज़र्द रंगों की ख़ुशबू में शायद नई ख़्वाहिशों के उफ़ुक़ हैं नए चाँद तारे
Ghalib Ahmad
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दोस्त रुख़्सत हो गए उन से मुलाक़ातें गईं बातें गईं शहर था आबाद जिन के दम-क़दम से वो हमारी चाँदनी रातें गईं मरने वाले मर गए ज़िंदा मगर हम भी नहीं वो तो ग़ुस्ल-ए-आख़िरी ले कर हुए फिर ताज़गी से आश्ना निथरे सुथरे ओढ़ कर अपनी सफ़ेदी के कफ़न काफ़ूर की ख़ुशबू को नथुनों में समाए सो गए आराम से ठंडे बदन अपनी अपनी क़ब्र पर तकिया किए वो थकन की इस मुसलसल सरसराहट से तो अब आज़ाद हैं साँस की ज़ंजीर से लटके हुए जागते रहने की काविश और लगन इस तग-ओ-दौ से परे आबाद हैं और हम जो इस किनारे पर खड़े रोज़-ओ-शब लहरों का करते हैं शुमार आप-बीती रोज़ सुनते हैं मगर ख़ामोश हैं ख़ामुशी से बहता पानी रोज़ बहता देखते हैं डूब जाने की मगर हिम्मत नहीं कौन जाने डूब ही जाएँ कहीं डूब जाओ या चले आओ इधर बाज़ आओ और फिर ज़िंदा रहो सातवाँ दर भी खुला है मुंतज़िर दाग़-ए-हिजरत दे गए ख़ुशबू के फूल कौन अब बन कर चराग़-ए-राह तुम को हाथ से उँगली पकड़ कर तिफ़्ल-ए-मकतब की तरह ले कर बढ़े और ये कहे मौत का लम्हा हमारी ज़िंदगी का आ गया जिस्म की ठंडक तो दस्तक दे रही है आओ कुछ बातें करें और फिर चलें दोस्त रुख़्सत हो गए
Ghalib Ahmad
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रौशनी रौशनी रौशनी हर तरफ़ रौशनी से कहो छोड़ जाए मुझे वक़्त का कारवाँ जा रहा है मगर अभी साथ ले कर न जाए मुझे मिरी आरज़ू है कि तू भी कभी दिल की जानिब वो रस्ता सुझाए मुझे मिरी रौशनी को मिरे नूर को मेरी आँखों से ले कर दिखाए मुझे ज़ुल्मत-ओ-मौत की वादियों में कभी अँधेरों की ख़ातिर लुटाए मुझे रात का दूसरा रुख़ जो देखा नहीं चाँद की दूसरी सम्त भी है तिरी कभी उस से भी तो मिलाए मुझे ज़िंदगी ज़िंदगी ज़िंदगी हर तरफ़ ज़िंदगी से कहो छोड़ जाए मुझे
Ghalib Ahmad
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