nazmKuch Alfaaz

"परिचय ग़रीबी का" चुप-चाप दर्द को समेट कर चेहरे पर मुस्कान ले जाता है घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है इसे डर नहीं घर में चोरी होने का , साँझ ढलते ही वो सो जाता है , ये मेहनत की कमाई करता है , किसी का हक़ नहीं मरता , केवल अपने हक का खाता है , न बँगला है न गाड़ी है , फिर भी पूरा शहर घूम लेता है , न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन , चार पहिए के उड़न खटोले पर , प्रकृति से रोमांस करता है, न पोल्यूशन, न गंदगी , स्वच्छता का प्रतीक बना, शहर-का-शहर भ्रमन करता है इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है , पूजा है, व्रत है, बंदगी है , एक छोटा सा परिवार है , बच्चा ही संसार है , ये मुस्कुराता हुआ चेहरा , साहब ये तो , एक गुपचुप बेचने वाला है, एक ठेला ठेलने वाला है

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए

Divya 'Kumar Sahab'

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है

Danish Balliavi

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"जय नालन्दा" जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें जिस ने ज्ञान का पाठ पढ़ाया प्रेम का सुख संदेश सुनाया जिस ने है सारिपुत्र दिलाया जिस ने शांति स्तूप बनाया कैसे भूले इस प्रतीक को हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें मगध की लाज है जिस ने बचाई भूमि पीड़ा में जो मुस्कुराई ज्योति जग- जग में फैलाई जिस भूमि पर एकता आई जन्म लिए सम्राट-जरासंध और बुद्ध हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें

Navneet krishna

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"नज़्म-ए-ज़िन्दगी" ज़िन्दगी हबाब है ज़िन्दगी तो ख़्वाब है ज़िन्दगी क़िताब है ज़िन्दगी हिसाब है ज़िन्दगी शराब भी ज़िन्दगी रबाब है । ज़िन्दगी सवाल भी और कभी जवाब है साँस पर तनी हुई ज़िन्दगी तनाब है बेबसी ही बेबसी ज़िन्दगी अज़ाब है हाँ मगर कभी कभी ज़िन्दगी रुबाब है ज़िन्दगी गुलाब है ज़िन्दगी इताब है अस्ल में ये ज़िन्दगी बंद कोई बाब है

Navneet krishna

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"ये है हम सबका हिंदुस्तान" यहाँ है हिन्दू मुसलमान यहाँ का सरमाया ईमान यहाँ देवों जैसे इंसान यहाँ का जग पर है एहसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ गंगा यमुना की धार हिमालय पर्वत का सरदार यहाँ का आला है किरदार कि जिस को मानता है संसार यहाँ बसते है बस इंसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ है गीता और क़ुरआन यहाँ के ग़ालिब और रसखान यहाँ तहज़ीबों का मिलान न जाने क्यूँ इसपर कुर्बान ये है हम सबका हिंदुस्तान

Navneet krishna

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"बेटियाँ " कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ सहने लगी हैं बेटियाँ माँ - बाप के लिए ही ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ पर इन्हीं के हाथों नालियों में बहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ क्या गुनाह है इनका जो इतना ज़ुल्म सहती हैं बेटियाँ नालियों में ही अक्सर न जाने क्यूँ बहती हैं बेटियाँ अपने ही घरों में क्यूँ मारी जा रही हैं बेटियाँ आज भी और कल भी दर्द की चोट से सिसकती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ न जाने क्यूँ पराई घर में बेची जा रही हैं बेटियाँ दर- बदर भटक रही हैं अक्सर क्यूँ बेटियाँ बेटो के चोट पे भी डराई जाती हैं बेटियाँ और जन्म लेते ही बस ज़िन्दा जलाई जाती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ बेटों के जन्म लेने के कारण आजन्म ही रह जाती हैं बेटियाँ कभी मंदिर में कभी मस्जिद में क्यूँ दबोची जा रही हैं बेटियाँ दर्द को आख़िर क्यूँ दर्द समेट रही हैं आजकल बेटियाँ हर तरह ज़ुल्म-ओ-सितम से सिर्फ़ एक दिन ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

Navneet krishna

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"हिंदी से हिंदुस्तान है" हिंदी मेरा ईमान है हिंदी ही मेरी जान है मैं ना जानू जाती-धर्म को ये अपना हिंदुस्तान है हिंदी मेरी भाषा प्यारी इस की बातें बड़ी निराली हिंदी में रहने वाला हिंदी हिंदी से हिंदुस्तान है

Navneet krishna

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