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"नज़्म-ए-ज़िन्दगी" ज़िन्दगी हबाब है ज़िन्दगी तो ख़्वाब है ज़िन्दगी क़िताब है ज़िन्दगी हिसाब है ज़िन्दगी शराब भी ज़िन्दगी रबाब है । ज़िन्दगी सवाल भी और कभी जवाब है साँस पर तनी हुई ज़िन्दगी तनाब है बेबसी ही बेबसी ज़िन्दगी अज़ाब है हाँ मगर कभी कभी ज़िन्दगी रुबाब है ज़िन्दगी गुलाब है ज़िन्दगी इताब है अस्ल में ये ज़िन्दगी बंद कोई बाब है

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"परिचय ग़रीबी का" चुप-चाप दर्द को समेट कर चेहरे पर मुस्कान ले जाता है घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है इसे डर नहीं घर में चोरी होने का , साँझ ढलते ही वो सो जाता है , ये मेहनत की कमाई करता है , किसी का हक़ नहीं मरता , केवल अपने हक का खाता है , न बँगला है न गाड़ी है , फिर भी पूरा शहर घूम लेता है , न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन , चार पहिए के उड़न खटोले पर , प्रकृति से रोमांस करता है, न पोल्यूशन, न गंदगी , स्वच्छता का प्रतीक बना, शहर-का-शहर भ्रमन करता है इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है , पूजा है, व्रत है, बंदगी है , एक छोटा सा परिवार है , बच्चा ही संसार है , ये मुस्कुराता हुआ चेहरा , साहब ये तो , एक गुपचुप बेचने वाला है, एक ठेला ठेलने वाला है

Navneet krishna

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"जय नालन्दा" जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें जिस ने ज्ञान का पाठ पढ़ाया प्रेम का सुख संदेश सुनाया जिस ने है सारिपुत्र दिलाया जिस ने शांति स्तूप बनाया कैसे भूले इस प्रतीक को हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें मगध की लाज है जिस ने बचाई भूमि पीड़ा में जो मुस्कुराई ज्योति जग- जग में फैलाई जिस भूमि पर एकता आई जन्म लिए सम्राट-जरासंध और बुद्ध हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें

Navneet krishna

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"ये है हम सबका हिंदुस्तान" यहाँ है हिन्दू मुसलमान यहाँ का सरमाया ईमान यहाँ देवों जैसे इंसान यहाँ का जग पर है एहसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ गंगा यमुना की धार हिमालय पर्वत का सरदार यहाँ का आला है किरदार कि जिस को मानता है संसार यहाँ बसते है बस इंसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ है गीता और क़ुरआन यहाँ के ग़ालिब और रसखान यहाँ तहज़ीबों का मिलान न जाने क्यूँ इसपर कुर्बान ये है हम सबका हिंदुस्तान

Navneet krishna

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"बेटियाँ " कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ सहने लगी हैं बेटियाँ माँ - बाप के लिए ही ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ पर इन्हीं के हाथों नालियों में बहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ क्या गुनाह है इनका जो इतना ज़ुल्म सहती हैं बेटियाँ नालियों में ही अक्सर न जाने क्यूँ बहती हैं बेटियाँ अपने ही घरों में क्यूँ मारी जा रही हैं बेटियाँ आज भी और कल भी दर्द की चोट से सिसकती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ न जाने क्यूँ पराई घर में बेची जा रही हैं बेटियाँ दर- बदर भटक रही हैं अक्सर क्यूँ बेटियाँ बेटो के चोट पे भी डराई जाती हैं बेटियाँ और जन्म लेते ही बस ज़िन्दा जलाई जाती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ बेटों के जन्म लेने के कारण आजन्म ही रह जाती हैं बेटियाँ कभी मंदिर में कभी मस्जिद में क्यूँ दबोची जा रही हैं बेटियाँ दर्द को आख़िर क्यूँ दर्द समेट रही हैं आजकल बेटियाँ हर तरह ज़ुल्म-ओ-सितम से सिर्फ़ एक दिन ज़िंदा रहती हैं बेटियाँ कुछ नहीं बहुत कुछ करने लगी हैं बेटियाँ

Navneet krishna

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"हरियाली मिशन" कहाँ वो धरती है मेरी जान थी जिस की हरियाली पहचान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ हवा में ज़हर घुली है आज ये पानी में भी मिला है आज बचाऊँ आज यहाँ पर जा उसे मैं ढूँढ़ता हूँ वो सुंदर साया अपने गाँव जहाँ थी ठंडी -ठंडी छाँव जहाँ जन्में ये सौर अरमान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ यहाँ थी कोयलिया की कूक यहाँ थी बाँसुरिया की फूँक फ़ज़ा में छाया था सुरतान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ कहाँ खोया वो हिंदुस्तान निराली जिस की थी हर-शान की जिस पर था हम को अभिमान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ

Navneet krishna

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