"ये है हम सबका हिंदुस्तान" यहाँ है हिन्दू मुसलमान यहाँ का सरमाया ईमान यहाँ देवों जैसे इंसान यहाँ का जग पर है एहसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ गंगा यमुना की धार हिमालय पर्वत का सरदार यहाँ का आला है किरदार कि जिस को मानता है संसार यहाँ बसते है बस इंसान ये है हम सबका हिंदुस्तान यहाँ है गीता और क़ुरआन यहाँ के ग़ालिब और रसखान यहाँ तहज़ीबों का मिलान न जाने क्यूँ इसपर कुर्बान ये है हम सबका हिंदुस्तान
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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun Elia
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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" तुम उसे अच्छा कहो " वो डाँटता है तुम उसे अच्छा कहो वो मानता है तुम उसे अच्छा कहो हर शख़्स बस तकलीफ़ देता है यहाँ वो प्यार करता तुम उसे अच्छा कहो सब शक्ल सूरत देखते ही हैं यहाँ दिखता उसे गुण तुम उसे अच्छा कहो सब बेवजह ही छोड़ जाते आजकल वो साथ देता तुम उसे अच्छा कहो शुभ बाँटना बस प्यार ही है चाहता अच्छा लगे तो तुम उसे अच्छा कहो
Shubham Rai 'shubh'
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"परिचय ग़रीबी का" चुप-चाप दर्द को समेट कर चेहरे पर मुस्कान ले जाता है घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है इसे डर नहीं घर में चोरी होने का , साँझ ढलते ही वो सो जाता है , ये मेहनत की कमाई करता है , किसी का हक़ नहीं मरता , केवल अपने हक का खाता है , न बँगला है न गाड़ी है , फिर भी पूरा शहर घूम लेता है , न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन , चार पहिए के उड़न खटोले पर , प्रकृति से रोमांस करता है, न पोल्यूशन, न गंदगी , स्वच्छता का प्रतीक बना, शहर-का-शहर भ्रमन करता है इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है , पूजा है, व्रत है, बंदगी है , एक छोटा सा परिवार है , बच्चा ही संसार है , ये मुस्कुराता हुआ चेहरा , साहब ये तो , एक गुपचुप बेचने वाला है, एक ठेला ठेलने वाला है
Navneet krishna
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"जय नालन्दा" जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें जिस ने ज्ञान का पाठ पढ़ाया प्रेम का सुख संदेश सुनाया जिस ने है सारिपुत्र दिलाया जिस ने शांति स्तूप बनाया कैसे भूले इस प्रतीक को हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें मगध की लाज है जिस ने बचाई भूमि पीड़ा में जो मुस्कुराई ज्योति जग- जग में फैलाई जिस भूमि पर एकता आई जन्म लिए सम्राट-जरासंध और बुद्ध हे नमन तुम्हें जय नालन्दा ज्ञान के दीपक हे नमन तुम्हें आदर आदाब आभार संग अभिनमन तुम्हें
Navneet krishna
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"हरियाली मिशन" कहाँ वो धरती है मेरी जान थी जिस की हरियाली पहचान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ हवा में ज़हर घुली है आज ये पानी में भी मिला है आज बचाऊँ आज यहाँ पर जा उसे मैं ढूँढ़ता हूँ वो सुंदर साया अपने गाँव जहाँ थी ठंडी -ठंडी छाँव जहाँ जन्में ये सौर अरमान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ यहाँ थी कोयलिया की कूक यहाँ थी बाँसुरिया की फूँक फ़ज़ा में छाया था सुरतान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ कहाँ खोया वो हिंदुस्तान निराली जिस की थी हर-शान की जिस पर था हम को अभिमान उसे मैं ढूँढ़ता हूँ
Navneet krishna
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"तुम सनम हो मेरे" तुम मनम हो मेरे तुम सनम हो मेरे ये हक़ीक़त रही तुम सनम हो मेरे तुम पे मैं हूँ फ़िदा तुम सनम हो मेरे दिल दिवाना है अब तुम सनम हो मेरे आप आए लब तक तुम सनम हो मेरे आप के दिल में हैं तुम सनम हो मेरे तेरा दिल मेरा है तुम सनम हो मेरे
Navneet krishna
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"नज़्म-ए-ज़िन्दगी" ज़िन्दगी हबाब है ज़िन्दगी तो ख़्वाब है ज़िन्दगी क़िताब है ज़िन्दगी हिसाब है ज़िन्दगी शराब भी ज़िन्दगी रबाब है । ज़िन्दगी सवाल भी और कभी जवाब है साँस पर तनी हुई ज़िन्दगी तनाब है बेबसी ही बेबसी ज़िन्दगी अज़ाब है हाँ मगर कभी कभी ज़िन्दगी रुबाब है ज़िन्दगी गुलाब है ज़िन्दगी इताब है अस्ल में ये ज़िन्दगी बंद कोई बाब है
Navneet krishna
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