पुजारन तेरी थाली के फूल सूरज की किरनों से कुम्हला जाएँगे माला भी सूख जाएगी मूर्ती की गर्दन में प्रेम की माला गूँध आँसुओं के मोती से अपनी मध-भरी तानों में कोई ब्याकुल राग अलाप
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता
Rohit tewatia 'Ishq'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"तुम से बे-पनाह मोहब्बत" मेरे नूर-ए-नज़र आ भी जा तू नज़र कब सुनाएगा मुझ को तू अच्छी ख़बर तेरा आशिक़ बेचारा परेशान है तुझ से नाराज़ है और हैरान है क़ासिद-ए-मोतबर ले जा मेरी ख़बर तेरी नज़रों से मिलती हैं ख़ामोशियाँ दिल में क्यूँ रखता है इतनी सरगोशियाँ खोल दे अब ज़बाँ ऐ मेरे हम सफ़र मेरे दिल की तमन्ना यहीं हैं सनम मैं रहूँ साथिया बन के सातों जनम बात हो जाए सच तू जो कह दे अगर टूट कर मेरा दिल ये बिखर जाएगा तू न होगा तो ''दानिश'' ये मर जाएगा सूख जाएगा ये ज़िंदगी का शजर
Danish Balliavi
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सोते सोते जो यकायक कभी खुल जाती है आँख नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र कहकशाँ से भी ज़ियादा है लताफ़त उस में आख़िर-ए-शब के मह-ए-नीम-फ़रोज़ाँ की तरह ख़्वाब-आवर सी शुआ'ओं में है लिपटी लिपटी फिर भी इस नर्म निगाही में हैं क्या तीर छुपे तंज़ है तल्ख़ी-ए-दौराँ का इक अफ़्साना है इस में हसरत भी शिकायत भी ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी दिल लरज़ जाता है और होती है वहशत तारी मुझ को महसूस ये होता है कि मुजरिम मैं हूँ ऐसा लगता है कि तोड़ा है किसी के दिल को दिल जो मासूम था बे-लौस था पाकीज़ा था क्या करूँँ क्या न करूँँ कोई मुदावा भी नहीं कुछ समझ में नहीं आता ये मुअ'म्मा क्या है नींद से उठते ज़रा डर सा मुझे लगता है नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र आह वो मीठी नज़र तल्ख़ नज़र पाक नज़र तीर-ओ-नश्तर हैं छुपे कितनी है सफ़्फ़ाक नज़र याद कुछ भी नहीं आता मुझे उस के आगे हाँ किसी युग में किसी ने मिरी पूजा की थी मैं ने उस को तो मगर ग़ौर से देखा भी नहीं प्यार की भेंट चढ़ाने कभी आया था कोई मैं ने मुँह फेर लिया देवी थी मैं पत्थर की लेकिन इस बात को कितने ही जनम बीत गए फिर भी पीछा मिरा करने से न वो बाज़ आया यूँँ ही सदियों से है मेरे ही लिए आवारा नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र
Bano Tahira Sayeed
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मेरे आज़ाद वतन तेरी बहारों को सलाम तेरी पुर-कैफ़ फ़ज़ा तेरे नज़ारों को सलाम जिन की ख़िदमात से चमकी है वतन की क़िस्मत जगमगाते हुए उन चाँद सितारों को सलाम कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम लिख गए अपने लहू से जो वफ़ा के क़िस्से उन शहीदों पे दरूद उन के मज़ारों को सलाम 'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी की हिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
Bano Tahira Sayeed
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आकाश पे दीप सितारों के धरती पर फूल बहारों के सब्ज़े पर शबनम के मोती सावन की हवा ठंडी ठंडी ये मेरे बिखरे सपने हैं लहराते हुए बहते चश्में चश्मों के नशात-आगीं नग़्में कोहसार के रंगीं शाम-ओ-सहर जंगल के हसीं दिलकश मंज़र ये मेरे बिखरे सपने हैं बिजली की कड़क बादल की गरज ख़ूँ-बार शफ़क़ ढलता सूरज महताब में नींद जवानी की और ख़ुशबू रात की रानी की ये मेरे बिखरे सपने हैं दरिया साहिल कश्ती लंगर हीरे मोती कंकर पत्थर परियों के महल इन्दर की सभा तीखी चितवन बाँका चेहरा ये मेरे बिखरे सपने हैं नज़्में ग़ज़लें आहें नग़्में ख़ून-ए-जिगर कुछ दल के टुकड़े भूली-बिसरी बीती बातें ग़म की अनोखी सी सौग़ातें ये मेरे बिखरे सपने हैं
Bano Tahira Sayeed
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कितनी मीठी ज़बाँ कैसी प्यारी ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में राधा के पायल की झंकार है ज़ुल्फ़-ए-ज़ेब-उन-निसा की भी महकार है इस में झांसी की रानी की ललकार है साज़-ओ-नग़्मा के हम-राह तलवार है उस के दामन में हैं कितनी रंगीनियाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ हिन्द माता की बेटी है उर्दू ज़बाँ साँवली चुलबुली नौजवाँ गुल-फ़िशाँ हिन्दू मुस्लिम के इख़्लास की दास्ताँ इत्तिहाद-ओ-मोहब्बत का क़ौमी निशाँ क्यूँ इसे ग़ैर कहता है ना-क़दर-दाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में सरमस्ती-ए-जाम-ए-शीराज़ है नज्द का सोज़ है हिन्द का साज़ है अपनी हर-दिल-अज़ीज़ी में मुम्ताज़ है अहल-ए-हिन्दोस्ताँ की ये आवाज़ है इस को कहते हैं सब दिल-कश-ओ-ख़ुश-बयाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ बोली जाती है कश्मीर से रास तक समझी जाती है गुजरात मद्रास तक ग़ैरियत की नहीं इस में बू-बास तक नफ़रतों का नहीं इस को एहसास तक ख़ास हिन्दोस्तानी है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ कह रही है ये भारत से उर्दू ज़बाँ मुझ से नाराज़ क्यूँ मादर-ए-मेहरबाँ तू मिरी मैं तिरी हमदम-ओ-राज़-दाँ फिर लगा ले गले से मुझे मेरी माँ 'ताहिरा' कुछ परेशाँ है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ
Bano Tahira Sayeed
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