आकाश पे दीप सितारों के धरती पर फूल बहारों के सब्ज़े पर शबनम के मोती सावन की हवा ठंडी ठंडी ये मेरे बिखरे सपने हैं लहराते हुए बहते चश्में चश्मों के नशात-आगीं नग़्में कोहसार के रंगीं शाम-ओ-सहर जंगल के हसीं दिलकश मंज़र ये मेरे बिखरे सपने हैं बिजली की कड़क बादल की गरज ख़ूँ-बार शफ़क़ ढलता सूरज महताब में नींद जवानी की और ख़ुशबू रात की रानी की ये मेरे बिखरे सपने हैं दरिया साहिल कश्ती लंगर हीरे मोती कंकर पत्थर परियों के महल इन्दर की सभा तीखी चितवन बाँका चेहरा ये मेरे बिखरे सपने हैं नज़्में ग़ज़लें आहें नग़्में ख़ून-ए-जिगर कुछ दल के टुकड़े भूली-बिसरी बीती बातें ग़म की अनोखी सी सौग़ातें ये मेरे बिखरे सपने हैं
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?
Aves Sayyad
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डिसबिलिटी एक फूल बगिया में मैं ने देखा है जिस में एक पंखुड़ी कम है बाक़ी सारे फूलों से पर उसे मुयस्सर है एक सा हवा पानी एक जैसे रंग-ओ-बू एक जैसा ही जादू तितलियाँ हों भँवरें हों या किसी की नज़रें हों उस में और औरों में फ़र्क़ ही नहीं करतीं हाँ मगर मिरे प्यारे ये चमन का क़िस्सा था आदमी की बस्ती में इस तरह नहीं होता फूल रोता रहता है फ़र्क़ होता रहता है
Ashu Mishra
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"जन्मदिन मुबारक" दिन ये सोने से, रातें ये रंगीन मुबारक ऐ मेरी साँसों की रवानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक भवरें मुस्काएँ, फूलों की डाली-डाली हँसें जब तू मुस्काए, तेरे होंठों की लाली हँसें मेरा कत़्ल करे, तेरे नैन कजरारे काले मजरूह हुए ना जाने कितने मतवाले तुझ को ये बहारें शौकीन मुबारक ऐ मेरी तसव्वुर की रानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक
Vikas Sangam
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मेरे आज़ाद वतन तेरी बहारों को सलाम तेरी पुर-कैफ़ फ़ज़ा तेरे नज़ारों को सलाम जिन की ख़िदमात से चमकी है वतन की क़िस्मत जगमगाते हुए उन चाँद सितारों को सलाम कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम लिख गए अपने लहू से जो वफ़ा के क़िस्से उन शहीदों पे दरूद उन के मज़ारों को सलाम 'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी की हिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
Bano Tahira Sayeed
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सोते सोते जो यकायक कभी खुल जाती है आँख नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र कहकशाँ से भी ज़ियादा है लताफ़त उस में आख़िर-ए-शब के मह-ए-नीम-फ़रोज़ाँ की तरह ख़्वाब-आवर सी शुआ'ओं में है लिपटी लिपटी फिर भी इस नर्म निगाही में हैं क्या तीर छुपे तंज़ है तल्ख़ी-ए-दौराँ का इक अफ़्साना है इस में हसरत भी शिकायत भी ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी दिल लरज़ जाता है और होती है वहशत तारी मुझ को महसूस ये होता है कि मुजरिम मैं हूँ ऐसा लगता है कि तोड़ा है किसी के दिल को दिल जो मासूम था बे-लौस था पाकीज़ा था क्या करूँँ क्या न करूँँ कोई मुदावा भी नहीं कुछ समझ में नहीं आता ये मुअ'म्मा क्या है नींद से उठते ज़रा डर सा मुझे लगता है नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र आह वो मीठी नज़र तल्ख़ नज़र पाक नज़र तीर-ओ-नश्तर हैं छुपे कितनी है सफ़्फ़ाक नज़र याद कुछ भी नहीं आता मुझे उस के आगे हाँ किसी युग में किसी ने मिरी पूजा की थी मैं ने उस को तो मगर ग़ौर से देखा भी नहीं प्यार की भेंट चढ़ाने कभी आया था कोई मैं ने मुँह फेर लिया देवी थी मैं पत्थर की लेकिन इस बात को कितने ही जनम बीत गए फिर भी पीछा मिरा करने से न वो बाज़ आया यूँँ ही सदियों से है मेरे ही लिए आवारा नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र
Bano Tahira Sayeed
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पुजारन तेरी थाली के फूल सूरज की किरनों से कुम्हला जाएँगे माला भी सूख जाएगी मूर्ती की गर्दन में प्रेम की माला गूँध आँसुओं के मोती से अपनी मध-भरी तानों में कोई ब्याकुल राग अलाप
Bano Tahira Sayeed
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कितनी मीठी ज़बाँ कैसी प्यारी ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में राधा के पायल की झंकार है ज़ुल्फ़-ए-ज़ेब-उन-निसा की भी महकार है इस में झांसी की रानी की ललकार है साज़-ओ-नग़्मा के हम-राह तलवार है उस के दामन में हैं कितनी रंगीनियाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ हिन्द माता की बेटी है उर्दू ज़बाँ साँवली चुलबुली नौजवाँ गुल-फ़िशाँ हिन्दू मुस्लिम के इख़्लास की दास्ताँ इत्तिहाद-ओ-मोहब्बत का क़ौमी निशाँ क्यूँ इसे ग़ैर कहता है ना-क़दर-दाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में सरमस्ती-ए-जाम-ए-शीराज़ है नज्द का सोज़ है हिन्द का साज़ है अपनी हर-दिल-अज़ीज़ी में मुम्ताज़ है अहल-ए-हिन्दोस्ताँ की ये आवाज़ है इस को कहते हैं सब दिल-कश-ओ-ख़ुश-बयाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ बोली जाती है कश्मीर से रास तक समझी जाती है गुजरात मद्रास तक ग़ैरियत की नहीं इस में बू-बास तक नफ़रतों का नहीं इस को एहसास तक ख़ास हिन्दोस्तानी है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ कह रही है ये भारत से उर्दू ज़बाँ मुझ से नाराज़ क्यूँ मादर-ए-मेहरबाँ तू मिरी मैं तिरी हमदम-ओ-राज़-दाँ फिर लगा ले गले से मुझे मेरी माँ 'ताहिरा' कुछ परेशाँ है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ
Bano Tahira Sayeed
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