मिरे सामने आइना है कि जिस में मुझे अपनी सूरत नज़र आ रही है मैं अपने ही चेहरे पे लिक्खी हुई दास्तानों को पढ़ता हूँ और सोचता हूँ कि जिन इजतिमाई मसाइल को मैं ने निगाहों के फैले हुए खंडरों में समोया हुआ है उन्हें कौन समझे उन्हें कौन जाने मुझे मुर्दा नस्लों के उस्लूब से हट के कहने की पादाश में इस ज़माने ने मुजरिम बनाया मिरी गुफ़्तुगू को मुअ'म्मा बनाया मिरी ज़ात में दफ़्न है इक ज़माना उसे कोई मेरी निगाहों से देखे
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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सर्दियों के मौसम में पिछली रात को छत पर हम जो एक दूजे से चाँदनी की बारिश में बे-ज़बान जज़्बों की ख़ुशबुओं से मिलते थे हुस्न-ए-दिलरुबा तेरा लफ़्ज़ की हक़ीक़त से कितना बे-तअल्लुक़ था अन-कहा सुना सब कुछ लम्हा-ए-मसर्रत था जब से लब-कुशाई के सिलसिले हुए जारी तेरी मेरी बहसों ने अन-कहा सुना सब कुछ मंतिक़ों दलीलों के वाहिमों से गदलाया और फिर मोहब्बत के सब गुलाब सँवलाए आज अज्नबिय्यत की बे-समर फ़ज़ाओं में हम कि एक दूजे से कितने बे-तअल्लुक़ हैं अव्वलीं रिफ़ाक़त की सारी ख़स्लतें खो कर इस बिसात-ए-हस्ती पर सिर्फ़ दो पयादे हैं
Yusuf Kamran
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कल शाम नहर की पटरी के साथ साथ मैं अपने ना-तवाँ कंधों पर एक शिकस्ता बोरी उठाए जा रहा था कि चीख़-ओ-पुकार शुरूअ' हुई पकड़ो पकड़ो क़ातिल क़ातिल नहर पर मुतअय्यन पुलीस चौकी के मुस्तइद अमले ने संगीनों से मेरा तआ'क़ुब किया मैं अपनी तमाम-तर क़ुव्वत से भागने के बावजूद चंद ही लम्हों में उन की आहनी गिरफ़्त में था पुलीस चौकी में सवालों की बोछाड़ से मेरी क़ुव्वत-ए-गोयाई जवाब दे गई एक मकरूह सूरत मोंछों वाला बा-वर्दी शख़्स वहशत-नाक आँखों से अमले की तरफ़ देखते हुए अपनी शदीद करख़्त आवाज़ में चीख़ा बोरी का मुँह खोलो सारा अमला शश्दर रह गया कि बोरी में लिपटी हुई लाश मेरी ही थी और मैं चुप साधे उसे तक रहा था
Yusuf Kamran
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ये आग पानी हवा ये मिट्टी ये वाहिमों की करिश्मा-साज़ी ये इल्म-ओ-फ़न के तमाम क़िस्से ये अक़्ल-ओ-दानिश की सारी बातें ये सब दिलासे बनावटी हैं मैं दोस्तों दुश्मनों की ज़द में हूँ हर कोई पेश-गोइयों के दराज़ क़िस्से सुना रहा है कि सब को अपने करंसी नोटों की फ़िक्र है हर कोई तलब और रसद के चक्कर में अपने भाव चढ़ा रहा है खुली फ़ज़ाओं में पर समेटे हुए परिंदे भी आने वाली सऊबतों के मुहीब मंज़र दिखा रहे हैं ये क्या है सब कुछ कि कुछ नहीं है हवा से की दस्तरस से बाला मिरे लिए सिर्फ़ वो सदाक़त है जो मिरे जिस्म-ओ-जाँ को छू कर गुज़र रही है कि मैं हक़ीक़ी मुशाहिदों तजरबों की भट्टी में जल रहा हूँ ये आग पानी हवा न मिट्टी है सिर्फ़ मैं हूँ ये सिर्फ़ मैं हूँ
Yusuf Kamran
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रात फिर यूँँ हुआ अध खुले आसमाँ पर परिंदों की चीख़ों में लिपटे हुए ख़्वाहिशों के बदन तिलमिलाने लगे मेरे कानों में मेरे दहकते हुए ख़ून की रंग की नूर की सीटियाँ सी बजीं फिर इरादों की छाती में नीली रगें मुंजमिद हो गईं फिर बदन की फ़सीलों के साए बने जुम्बिशों में वही सरसराहट हुई फिर मिरे जिस्म की दूधिया चाँदनी हर तरफ़ छा गई और मैं जिस्म-ओ-जाँ की शिकन-दर-शिकन उलझनों को समेटे हुए सो गया रात फिर यूँँ हुआ
Yusuf Kamran
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कभी लड़कियों के तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखने को मकानों की छत पर खड़े हो के यारो जो हम नंगे पाँव के तलवे जलाते तो अपने बदन की हरारत से सारी नसें फड़फड़ातीं मगर लड़कियों को ख़बर तक न होती अगर अब मकानों की ऊँची छतों पर खड़े हो के तुम ने तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखनी हों तो तलवे जलाने से बेहतर यही है कि कुछ गुनगुनाओ तुम्हारे बदन की नसें सर्द करने को सब लड़कियाँ बा-ख़बर हो चुकी हैं
Yusuf Kamran
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