दिन लड़खड़ाता है दुनिया अपने सुकूत में डगमगाती है हर शय क़ाबिल-ए-दीद मगर गुरेज़ाँ है सब कुछ नज़दीक है मगर ना-मुम्किन किताब आईना कपड़े पिंजरा और परिंदा अपने नामों के साए में बे-हरकत वक़्त धड़कता है मेरे सीने में लहू की न बदलने वाली आज़ुर्दा ताल पर धूप-छाँव से बे-नियाज़ दीवार मब्नी-बर-वहम तस्वीरों के तिमसाल घर में बदल जाती है मैं ख़ुद को अपनी ज़ात पर पहरा देती आँख के मरकज़ में छुपाता हूँ मैं सिमटता हूँ मैं बिखरता हूँ मैं फ़क़त एक वक़्फ़ा हूँ रुकने और चलने के दरमियान जीने और मरने के दरमियान मैं एक आहट हूँ ना-क़ाबिल-ए-शुनीद महीन पल के लिए रात ब-ज़ाहिर बे-कनार है फिर भी मैं सर को उठाता हूँ आसमान पर सितारों की मख़्फ़ी तहरीर अचानक मुझ पर मुस्कुराती है और अनजाने में मैं जान जाता हूँ कि मुझे लिखा गया मिटने के लिए
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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मेरे पास तीन चीज़ें हैं रेत मुझे विरासत में मिली पत्थर मैं ने मेहनत से कमाया और ये थोड़ी सी धूप मुझे सड़क पर पड़ी हुई मिली मैं ने रेत से अपनी उम्र बनाई मैं ने पत्थर अपने पेट पर बाँधा मैं ने धूप से अपना साया बनाया मैं अपने साए में चलता हूँ मैं अपनी धूप में जलता हूँ मैं किसी पेड़ का एहसान नहीं लूँगा चलते चलते इक दिन अपने साए पर गिर जाऊँगा तुम मुझे मेरी रेत में दफ़्न करना मेरा पत्थर मेरे पेट से खोल कर मेरी क़ब्र का कतबा बनाना और मेरी धूप को आज़ाद कर देना
Iftikhar Bukhari
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शायद एक साथ सीखता है आदमी चलना और सोचना एक सहन में एक दिन मैं सीख गया चलना और सोचना चिड़ियों पौदों और रंग बिरंगे कीड़ों के दरमियान माँ कहती तुम इतना चलते हो एक सीध में चलो तो शाम तक पहुँच जाओ किसी और शहर में मैं ने आवारगी की दोपहरों में अकेले तारों भरी रातों में उदास शाइ'रों और जुगनुओं के साथ मैं चलता रहा गलियों में शाह-राहों पर जुलूसों में जनाज़ों के साथ सोचते हुए ना-इंसाफ़ी इंक़िलाब मौत ख़ुदा और जहन्नुम और बहुत सी फ़ुज़ूलियात मैं चलता रहा बारिशों में बर्फ़-बारियों में धुंद में धूप और आँधियों में सोचते हुए जो मैं बता सकता हूँ फ़ख़्र से और वो भी जो मैं ख़ुद से भी छुपाता हूँ मैं अजनबी मुल्कों में गया तन्हा चलने के लिए तन्हा सोचने के लिए अब मैं लौट आया हूँ ढलती उम्र में बग़ैर कहीं पहुँचे हुए अब मैं कहीं नहीं जाता पर अब भी चलता हूँ हर रोज़ कम-अज़-कम एक घंटा तेज़ तेज़ पावँ चक्की पर ये सोचते हुए कि मैं कब तक चलूँगा मैं कब तक सोचूँगा
Iftikhar Bukhari
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मैं सोचता हूँ अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल-क़दमी की तरह यख़-बस्ता पहाड़ों में सफ़ेद सुरंगों जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर-असरार भटकने के लिए या दुनिया-दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियाँ होतीं क़दीम चट्टान पर कंदा ना-क़ाबिल-ए-फ़हम नुक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते मेरे जीते जी आख़िरी हिचकी लेने के लिए या मेरे बा'द कुछ पल मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते सुब्ह-ए-काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए उम्र गुज़ार कर मैं सोचता हूँ ये मुमकिन नहीं इस दुनिया की बे-इंतिहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाए दो तन्हाइयों के तू और मैं
Iftikhar Bukhari
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तुम तो कहते थे दुनिया बदलने को है छोटे छोटे थे हम फ़लसफ़ी कह के सब छेड़ते थे तुम्हें फुलाँ ने कहा है फुलाँ ने लिखा है किताबों से देते थे अक्सर हवाले सवेरे सवेरे मुझे रोज़ ले जाते थे साथ इस्टाल पर मुफ़्त अख़बार पढ़ने ये धुन थी कि बस हो न हो आज दुनिया बदलने की अच्छी ख़बर छप गई हो ज़माने की आँधी में उड़ते हुए टुकड़े अख़बार के हम जुदा हो गए फिर मिले ही नहीं इफ़्तिख़ार अब मिरे शीशा-ए-उम्र में आख़िरी रेत है चंद आइंदा अख़बार बाक़ी हैं शायद तिरे नक़्श धुँदला चुके हैं मिरी याद में पर तिरा नाम मैं भूल सकता नहीं मेरे बचपन के ऐ दोस्त हम दोनों हमनाम थे ना नहीं जानता तुम कहाँ हो या शायद नहीं हो अभी तक मिरी तरह दुनिया में दुनिया जो बदली नहीं हाँ जो इस्टाल था ना वो अख़बार का रेलवे रोड पर उस जगह एक जूतों की दुकान है उस ज़माने के हॉकर सभी मर चुके हैं
Iftikhar Bukhari
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कितने समुंदर कितने सहरा जंगल और बारिशें बे-शुमार आईनों का ख़ाली-पन लम्हे या सदियाँ उबूर कर के दाख़िल हुई मेरी तन्हाई तेरी तन्हाई में ऐ शहर-ए-गुल-ए-सुर्ख़ ऐ अज़ीम ख़ूब-सूरत पत्थर मुझे ख़ज़ाने से कोई सरोकार नहीं जहाँ खूंटे से बँधा लाल घोड़ा तेईस सौ बरस की बे-ख़्वाबी में ईस्तादा है मुझे फ़क़त तेरी उदास रात का एक कोना दरकार है कि मेरी ख़ामोशी तेरी ख़ामोशी से कलाम करे मेरे पास अफ़्सोस की कहानी है जिसे सुन कर क़दीम चाँद रेत के आँसू बहाएगा कि तेरे मातमी गुलाब सैराब हों उड़ते ज़मानों की धज्जियाँ गुम-शुदा 'उम्रों की राइगानी तारीख़ की मुनाफ़िक़ अलमारियों में लटकते उस्तुख़्वाँ मुझे अमानतदार पाएँगे बर्बाद दीवारों की ख़राशों से झाँकता इंहिमाक नहीं टूटेगा ऐ गुलाब शहर मैं बे-ज़बान क़िस्सा-गो एक शब-बसरी का सवाली हूँ तेरे संगीन दरवाज़े पर मैं तुझे तेरे जैसा अपना दिल हदिया करूँँगा पत्थर का गुलाब तुझे ख़ामोश दास्तान सुनाऊँगा किसी बहुत क़दीम ज़माने की गुनाहगार ख़ुदाओं से दूर ख़ालिस इबादत गुज़ार अँधेरे में सुब्ह-ए-अबद के आख़िरी क़हक़हे से बे-नियाज़
Iftikhar Bukhari
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