nazmKuch Alfaaz

मेरे पास तीन चीज़ें हैं रेत मुझे विरासत में मिली पत्थर मैं ने मेहनत से कमाया और ये थोड़ी सी धूप मुझे सड़क पर पड़ी हुई मिली मैं ने रेत से अपनी उम्र बनाई मैं ने पत्थर अपने पेट पर बाँधा मैं ने धूप से अपना साया बनाया मैं अपने साए में चलता हूँ मैं अपनी धूप में जलता हूँ मैं किसी पेड़ का एहसान नहीं लूँगा चलते चलते इक दिन अपने साए पर गिर जाऊँगा तुम मुझे मेरी रेत में दफ़्न करना मेरा पत्थर मेरे पेट से खोल कर मेरी क़ब्र का कतबा बनाना और मेरी धूप को आज़ाद कर देना

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मैं सोचता हूँ अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल-क़दमी की तरह यख़-बस्ता पहाड़ों में सफ़ेद सुरंगों जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर-असरार भटकने के लिए या दुनिया-दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियाँ होतीं क़दीम चट्टान पर कंदा ना-क़ाबिल-ए-फ़हम नुक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते मेरे जीते जी आख़िरी हिचकी लेने के लिए या मेरे बा'द कुछ पल मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते सुब्ह-ए-काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए उम्र गुज़ार कर मैं सोचता हूँ ये मुमकिन नहीं इस दुनिया की बे-इंतिहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाए दो तन्हाइयों के तू और मैं

Iftikhar Bukhari

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शायद एक साथ सीखता है आदमी चलना और सोचना एक सहन में एक दिन मैं सीख गया चलना और सोचना चिड़ियों पौदों और रंग बिरंगे कीड़ों के दरमियान माँ कहती तुम इतना चलते हो एक सीध में चलो तो शाम तक पहुँच जाओ किसी और शहर में मैं ने आवारगी की दोपहरों में अकेले तारों भरी रातों में उदास शाइ'रों और जुगनुओं के साथ मैं चलता रहा गलियों में शाह-राहों पर जुलूसों में जनाज़ों के साथ सोचते हुए ना-इंसाफ़ी इंक़िलाब मौत ख़ुदा और जहन्नुम और बहुत सी फ़ुज़ूलियात मैं चलता रहा बारिशों में बर्फ़-बारियों में धुंद में धूप और आँधियों में सोचते हुए जो मैं बता सकता हूँ फ़ख़्र से और वो भी जो मैं ख़ुद से भी छुपाता हूँ मैं अजनबी मुल्कों में गया तन्हा चलने के लिए तन्हा सोचने के लिए अब मैं लौट आया हूँ ढलती उम्र में बग़ैर कहीं पहुँचे हुए अब मैं कहीं नहीं जाता पर अब भी चलता हूँ हर रोज़ कम-अज़-कम एक घंटा तेज़ तेज़ पावँ चक्की पर ये सोचते हुए कि मैं कब तक चलूँगा मैं कब तक सोचूँगा

Iftikhar Bukhari

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तुम तो कहते थे दुनिया बदलने को है छोटे छोटे थे हम फ़लसफ़ी कह के सब छेड़ते थे तुम्हें फुलाँ ने कहा है फुलाँ ने लिखा है किताबों से देते थे अक्सर हवाले सवेरे सवेरे मुझे रोज़ ले जाते थे साथ इस्टाल पर मुफ़्त अख़बार पढ़ने ये धुन थी कि बस हो न हो आज दुनिया बदलने की अच्छी ख़बर छप गई हो ज़माने की आँधी में उड़ते हुए टुकड़े अख़बार के हम जुदा हो गए फिर मिले ही नहीं इफ़्तिख़ार अब मिरे शीशा-ए-उम्र में आख़िरी रेत है चंद आइंदा अख़बार बाक़ी हैं शायद तिरे नक़्श धुँदला चुके हैं मिरी याद में पर तिरा नाम मैं भूल सकता नहीं मेरे बचपन के ऐ दोस्त हम दोनों हमनाम थे ना नहीं जानता तुम कहाँ हो या शायद नहीं हो अभी तक मिरी तरह दुनिया में दुनिया जो बदली नहीं हाँ जो इस्टाल था ना वो अख़बार का रेलवे रोड पर उस जगह एक जूतों की दुकान है उस ज़माने के हॉकर सभी मर चुके हैं

Iftikhar Bukhari

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दिन लड़खड़ाता है दुनिया अपने सुकूत में डगमगाती है हर शय क़ाबिल-ए-दीद मगर गुरेज़ाँ है सब कुछ नज़दीक है मगर ना-मुम्किन किताब आईना कपड़े पिंजरा और परिंदा अपने नामों के साए में बे-हरकत वक़्त धड़कता है मेरे सीने में लहू की न बदलने वाली आज़ुर्दा ताल पर धूप-छाँव से बे-नियाज़ दीवार मब्नी-बर-वहम तस्वीरों के तिमसाल घर में बदल जाती है मैं ख़ुद को अपनी ज़ात पर पहरा देती आँख के मरकज़ में छुपाता हूँ मैं सिमटता हूँ मैं बिखरता हूँ मैं फ़क़त एक वक़्फ़ा हूँ रुकने और चलने के दरमियान जीने और मरने के दरमियान मैं एक आहट हूँ ना-क़ाबिल-ए-शुनीद महीन पल के लिए रात ब-ज़ाहिर बे-कनार है फिर भी मैं सर को उठाता हूँ आसमान पर सितारों की मख़्फ़ी तहरीर अचानक मुझ पर मुस्कुराती है और अनजाने में मैं जान जाता हूँ कि मुझे लिखा गया मिटने के लिए

Iftikhar Bukhari

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चलती रहती है दाएँ बाएँ आगे पीछे साथ साथ धीरे धीरे या तेज़ क़दमों से जैसे ख़िराम करती है हवा बे-पनाह रातों में काँटों और झाड़ियों में बे-ख़बरी के नक़्शों में चलती रहती है कोई बे-मा'नी गुफ़्तुगू उम्र गुज़ारने के लिए दूरियों के दरमियान हिज्र-ओ-विसाल के कोहरे में यख़-बस्ता ख़ामोश रस्तों में चलती रहती है कुछ देर तक कोई ना-क़ाबिल-ए-फ़हम चाल अपने ख़िलाफ़ आज़ुर्दा वुसअ'तों की बिसात पर अज़ल और अबद की बे-मा'नी हमेश्गी में जीने की जुस्तुजू में मरने की आरज़ू में

Iftikhar Bukhari

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