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चलती रहती है दाएँ बाएँ आगे पीछे साथ साथ धीरे धीरे या तेज़ क़दमों से जैसे ख़िराम करती है हवा बे-पनाह रातों में काँटों और झाड़ियों में बे-ख़बरी के नक़्शों में चलती रहती है कोई बे-मा'नी गुफ़्तुगू उम्र गुज़ारने के लिए दूरियों के दरमियान हिज्र-ओ-विसाल के कोहरे में यख़-बस्ता ख़ामोश रस्तों में चलती रहती है कुछ देर तक कोई ना-क़ाबिल-ए-फ़हम चाल अपने ख़िलाफ़ आज़ुर्दा वुसअ'तों की बिसात पर अज़ल और अबद की बे-मा'नी हमेश्गी में जीने की जुस्तुजू में मरने की आरज़ू में

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"हौसला" हौसला रख रास्ते दिखने लगेंगे ये अँधेरे सुब्ह तक छटने लगेंगे क़ाफ़िले पर क़ाफ़िले गुज़रे यहाँ से देखना कुछ नक़्श-ए-पा आगे मिलेंगे लड़-खड़ाते हौसलों को फिर उठा कर सुब्ह होते ही सफ़र पर चल पड़ेंगे ठोकरों से कह दो के दम-ख़म लगा दें हम गिरेंगे फिर उठेंगे पर चलेंगे

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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"बे-असर हिज्र" यार तेरे जाने से कुछ नहीं बदला ये झूठ नहीं है सचमुच नहीं बदला हाँ आज भी वही अदाएँ हैं मेरी वही लहजा है वही सदाएँ हैं मेरी कभी मैं ने ख़ुद पर ग़म तारी न किया तेरी बे-रुख़ी को कहीं जारी ना किया हर बात पर मुस्कुराने की आदत न गई तेरे ख़ातिर रातों की इबादत न गई बा'द तेरे जाने के कई ख़्वाब सजाए हैं तू नहीं तो तेरी यादों को शे'र सुनाए हैं बस यही बताना था कि कुछ नहीं बदला ये झूठ नहीं है सचमुच नहीं बदला

"Nadeem khan' Kaavish"

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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

Jaun Elia

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‘’निगाह’’ किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी अक्स मेरा मिलेगा जिस जगह देखोगी जान मोहब्बत फ़िज़ूल नहीं बस थोड़ा सब्र करो नाग़वार गुज़रे इश्क़ की पनाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर मसअला कुछ इनकार का ज़रूर रहा होगा जिस सेे ख़ुद बे-ख़बर हूँ वो मेरा क़ुसूर रहा होगा फिर इल्ज़ाम सारे बेबुनियाद से आएँगे आगे मेरे ख़िलाफ़ ना एक मिलेगा जो गवाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी पर तेरा छोड़ के जाना मोहब्बत की तौहीन था मेरा क्या? मेरा दिल तो टूटने का शौक़ीन था अभी एक दुआ क़ुबूल होनी आम बात समझती हो फिर कोई मंदिर और सालो साल कोई दरग़ाह देखोगी किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी

Rohit tewatia 'Ishq'

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अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्तां आगे और भी है अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो! अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं अभी तो किरदार ही बुझे हैं। अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के अभी तो एहसास जी रहा है। ये लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है ये लौ बचा लो यहीं से जुस्तजू फिर बगूला बन कर यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रौशनी को ले कर कहीं तो अंजान-ए-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!

Gulzar

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तुम तो कहते थे दुनिया बदलने को है छोटे छोटे थे हम फ़लसफ़ी कह के सब छेड़ते थे तुम्हें फुलाँ ने कहा है फुलाँ ने लिखा है किताबों से देते थे अक्सर हवाले सवेरे सवेरे मुझे रोज़ ले जाते थे साथ इस्टाल पर मुफ़्त अख़बार पढ़ने ये धुन थी कि बस हो न हो आज दुनिया बदलने की अच्छी ख़बर छप गई हो ज़माने की आँधी में उड़ते हुए टुकड़े अख़बार के हम जुदा हो गए फिर मिले ही नहीं इफ़्तिख़ार अब मिरे शीशा-ए-उम्र में आख़िरी रेत है चंद आइंदा अख़बार बाक़ी हैं शायद तिरे नक़्श धुँदला चुके हैं मिरी याद में पर तिरा नाम मैं भूल सकता नहीं मेरे बचपन के ऐ दोस्त हम दोनों हमनाम थे ना नहीं जानता तुम कहाँ हो या शायद नहीं हो अभी तक मिरी तरह दुनिया में दुनिया जो बदली नहीं हाँ जो इस्टाल था ना वो अख़बार का रेलवे रोड पर उस जगह एक जूतों की दुकान है उस ज़माने के हॉकर सभी मर चुके हैं

Iftikhar Bukhari

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मैं सोचता हूँ अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल-क़दमी की तरह यख़-बस्ता पहाड़ों में सफ़ेद सुरंगों जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर-असरार भटकने के लिए या दुनिया-दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियाँ होतीं क़दीम चट्टान पर कंदा ना-क़ाबिल-ए-फ़हम नुक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते मेरे जीते जी आख़िरी हिचकी लेने के लिए या मेरे बा'द कुछ पल मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते सुब्ह-ए-काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए उम्र गुज़ार कर मैं सोचता हूँ ये मुमकिन नहीं इस दुनिया की बे-इंतिहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाए दो तन्हाइयों के तू और मैं

Iftikhar Bukhari

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मेरे पास तीन चीज़ें हैं रेत मुझे विरासत में मिली पत्थर मैं ने मेहनत से कमाया और ये थोड़ी सी धूप मुझे सड़क पर पड़ी हुई मिली मैं ने रेत से अपनी उम्र बनाई मैं ने पत्थर अपने पेट पर बाँधा मैं ने धूप से अपना साया बनाया मैं अपने साए में चलता हूँ मैं अपनी धूप में जलता हूँ मैं किसी पेड़ का एहसान नहीं लूँगा चलते चलते इक दिन अपने साए पर गिर जाऊँगा तुम मुझे मेरी रेत में दफ़्न करना मेरा पत्थर मेरे पेट से खोल कर मेरी क़ब्र का कतबा बनाना और मेरी धूप को आज़ाद कर देना

Iftikhar Bukhari

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शायद एक साथ सीखता है आदमी चलना और सोचना एक सहन में एक दिन मैं सीख गया चलना और सोचना चिड़ियों पौदों और रंग बिरंगे कीड़ों के दरमियान माँ कहती तुम इतना चलते हो एक सीध में चलो तो शाम तक पहुँच जाओ किसी और शहर में मैं ने आवारगी की दोपहरों में अकेले तारों भरी रातों में उदास शाइ'रों और जुगनुओं के साथ मैं चलता रहा गलियों में शाह-राहों पर जुलूसों में जनाज़ों के साथ सोचते हुए ना-इंसाफ़ी इंक़िलाब मौत ख़ुदा और जहन्नुम और बहुत सी फ़ुज़ूलियात मैं चलता रहा बारिशों में बर्फ़-बारियों में धुंद में धूप और आँधियों में सोचते हुए जो मैं बता सकता हूँ फ़ख़्र से और वो भी जो मैं ख़ुद से भी छुपाता हूँ मैं अजनबी मुल्कों में गया तन्हा चलने के लिए तन्हा सोचने के लिए अब मैं लौट आया हूँ ढलती उम्र में बग़ैर कहीं पहुँचे हुए अब मैं कहीं नहीं जाता पर अब भी चलता हूँ हर रोज़ कम-अज़-कम एक घंटा तेज़ तेज़ पावँ चक्की पर ये सोचते हुए कि मैं कब तक चलूँगा मैं कब तक सोचूँगा

Iftikhar Bukhari

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दिन लड़खड़ाता है दुनिया अपने सुकूत में डगमगाती है हर शय क़ाबिल-ए-दीद मगर गुरेज़ाँ है सब कुछ नज़दीक है मगर ना-मुम्किन किताब आईना कपड़े पिंजरा और परिंदा अपने नामों के साए में बे-हरकत वक़्त धड़कता है मेरे सीने में लहू की न बदलने वाली आज़ुर्दा ताल पर धूप-छाँव से बे-नियाज़ दीवार मब्नी-बर-वहम तस्वीरों के तिमसाल घर में बदल जाती है मैं ख़ुद को अपनी ज़ात पर पहरा देती आँख के मरकज़ में छुपाता हूँ मैं सिमटता हूँ मैं बिखरता हूँ मैं फ़क़त एक वक़्फ़ा हूँ रुकने और चलने के दरमियान जीने और मरने के दरमियान मैं एक आहट हूँ ना-क़ाबिल-ए-शुनीद महीन पल के लिए रात ब-ज़ाहिर बे-कनार है फिर भी मैं सर को उठाता हूँ आसमान पर सितारों की मख़्फ़ी तहरीर अचानक मुझ पर मुस्कुराती है और अनजाने में मैं जान जाता हूँ कि मुझे लिखा गया मिटने के लिए

Iftikhar Bukhari

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