अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्तां आगे और भी है अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो! अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं अभी तो किरदार ही बुझे हैं। अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के अभी तो एहसास जी रहा है। ये लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है ये लौ बचा लो यहीं से जुस्तजू फिर बगूला बन कर यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रौशनी को ले कर कहीं तो अंजान-ए-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"एक दिन" एक दिन तुम उठोगी बिस्तर से तुम्हें मेरा ख़्याल आएगा और याद आएगी मेरी मोहब्बत, मेरी बातें कैसे एक शख़्स ने तुम्हें चाहा था बेइंतहा और फिर तुम मेरी तस्वीर देखोगी तुम्हारी आँखों में आँसू होंगे तुम चाहकर भी मुझे भुला नहीं पाओगी अभी तो तुम मुक़र जाओगी मगर उस वक़्त किधर जाओगी? घर की दर-ओ-दीवार देखोगी मेरी तस्वीरें बनती नज़र आएगी दहलीज़ से मेरी सदाएँ आएगी तुम मेरी यादों में ख़ुद को तन्हा पाओगी और सोचोगी अपने इस अंदाज़ पर जिस तरह तुम ने मुझे रुलाया, सताया मगर तब मैं वहाँ नहीं रहूँगा फूलों की ख़ुशबुओं में बारिश की बूंदों में सुब्ह की चाय में मुझे देखोगी, मुझे ही पाओगी हर शख़्स में मेरा चेहरा दिखेगा निगाहों में मेरे ख़्वाबों का पहरा होगा ज़ेहन में बस मेरे ख़याल आएँगे मेरी पाक मोहब्बत होगी और तुम्हारा दिल उस वक़्त तुम सेे सवाल पूछेगा क्या कमी थी उस में जो इस तरह तन्हा किया वो शख़्स जो मुझ सेे मोहब्बत करता था उसे इस तरह रुस्वा किया इसी सोच में डूबी तुम ख़ुद ही रोने लग जाओगी पछताओगी और उस वक़्त, बस उस वक़्त मेरी यादों में खो जाओगी
Prit
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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वो पुल की सातवीं सीढ़ी पे बैठा कहता रहता था किसी थैले में भर के गर ख़याल अपने मैं दरवाज़े पे हरकारे की सूरत जा के पहुँचाता चमकती बूँदें बारिश की किसी की जेब में भर के गले में बादलों का एक मफ़लर डाल कर आता वो भीगा भीगा सा रहता किसी के कान में दो बालियों से चाँद पहनाता मछेरों की कोई लड़की अगर मिलती गरजते बादलों को बाँध कर बालों के जोड़े में धनक की बीनी दे आता मुझे गर कहकशाँ को बाँटने का हक़ दिया होता ख़ुदा ने तो कोई फ़ुटपाथ से बोला ऐ औलाद शाइ'र की बहुत खाई हैं रूखी रोटियाँ मैं ने जो ला सकता है तो इक बार कुछ सालन ही ला कर दे
Gulzar
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देखो, आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा देखना, सोच-संभल कर ज़रा पाँव रखना ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में ख़्वाब टूटे ने कोई, जाग न जाए देखो जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा।
Gulzar
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वो जो शाइ'र था वो जो शाइ'र था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी-सी बातें करता था आँखें कानों पे रख के सुनता था गूँगी खामोशियों की आवाज़ें! जमा करता था चाँद के साए और गीली- सी नूर की बूँदें रूखे-रूखे- से रात के पत्ते ओक में भर के खरखराता था वक़्त के इस घनेरे जंगल में कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था हाँ वही, वो अजीब- सा शाइ'र रात को उठ के कोहनियों के बल चाँद की ठोड़ी चूमा करता था चाँद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुद-कुशी की है
Gulzar
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एक बौछार था वो शख़्स, बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से जो भिगो देता था एक बोछार ही था वो, जो कभी धूप की अफ़शां भर के दूर तक, सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था नीम तारीक से हॉल में आँखें चमक उठती थीं सर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह, लगता था झोंका हवा का था कोई छेड़ गया है गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह मुस्कराहट में कई तरबों की झनकार छुपी थी गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनकार था वो एक आवाज़ की बौछार था वो
Gulzar
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कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है उर्दू तो लगता है, दिन जाड़ों के हैं, खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही है.
Gulzar
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