वो पुल की सातवीं सीढ़ी पे बैठा कहता रहता था किसी थैले में भर के गर ख़याल अपने मैं दरवाज़े पे हरकारे की सूरत जा के पहुँचाता चमकती बूँदें बारिश की किसी की जेब में भर के गले में बादलों का एक मफ़लर डाल कर आता वो भीगा भीगा सा रहता किसी के कान में दो बालियों से चाँद पहनाता मछेरों की कोई लड़की अगर मिलती गरजते बादलों को बाँध कर बालों के जोड़े में धनक की बीनी दे आता मुझे गर कहकशाँ को बाँटने का हक़ दिया होता ख़ुदा ने तो कोई फ़ुटपाथ से बोला ऐ औलाद शाइ'र की बहुत खाई हैं रूखी रोटियाँ मैं ने जो ला सकता है तो इक बार कुछ सालन ही ला कर दे
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"अजीब" कितना अजीब हूँ मैं अक्सर उदास रहता हूँ तन्हाई से बातें करता हूँ महफ़िल में ऊब जाता हूँ चाँद को छूना चाहता हूँ सूरज कि तरह जलता हूँ फूलों से नफरत करता हूँ काँटों को पसंद करता हूँ पेड़ के नीचे सोता हूँ रेत पर घर करता हूँ भूलने की कोशिश करता हूँ बात भी तिरी करता हूँ शायद बहुत अजीब हूँ मैं ख़ुद से सवाल करता हूँ
ALI ZUHRI
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डिसबिलिटी एक फूल बगिया में मैं ने देखा है जिस में एक पंखुड़ी कम है बाक़ी सारे फूलों से पर उसे मुयस्सर है एक सा हवा पानी एक जैसे रंग-ओ-बू एक जैसा ही जादू तितलियाँ हों भँवरें हों या किसी की नज़रें हों उस में और औरों में फ़र्क़ ही नहीं करतीं हाँ मगर मिरे प्यारे ये चमन का क़िस्सा था आदमी की बस्ती में इस तरह नहीं होता फूल रोता रहता है फ़र्क़ होता रहता है
Ashu Mishra
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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देखो, आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा देखना, सोच-संभल कर ज़रा पाँव रखना ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में ख़्वाब टूटे ने कोई, जाग न जाए देखो जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा।
Gulzar
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वो जो शाइ'र था वो जो शाइ'र था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी-सी बातें करता था आँखें कानों पे रख के सुनता था गूँगी खामोशियों की आवाज़ें! जमा करता था चाँद के साए और गीली- सी नूर की बूँदें रूखे-रूखे- से रात के पत्ते ओक में भर के खरखराता था वक़्त के इस घनेरे जंगल में कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था हाँ वही, वो अजीब- सा शाइ'र रात को उठ के कोहनियों के बल चाँद की ठोड़ी चूमा करता था चाँद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुद-कुशी की है
Gulzar
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क्या लिए जाते हो तुम कंधों पे यारो इस जनाज़े में तो कोई भी नहीं है, दर्द है कोई, न हसरत है, न ग़म है मुस्कुराहट की अलामत है न कोई आह का नुक़्ता और निगाहों की कोई तहरीर न आवाज़ का कतरा क़ब्र में क्या दफ़्न करने जा रहे हो? सिर्फ़ मिट्टी है ये मिट्टी- मिट्टी को मिट्टी में दफ़नाते हुए रोेते हो क्यूँ ?
Gulzar
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अजीब सा अमल है ये ये एक फ़र्ज़ी गुफ़्तगू, और एकतर्फ़ा— एक ऐसे शख़्स से, ख़याल जिस की शक्ल है ख़याल ही सबूत है!
Gulzar
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"अकेले" किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं चंद क़दमों के निशाँ हाँ कभी मिलते हैं कहीं साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चंद क़दम और फिर टूट के गिर जाते हैं ये कहते हुए अपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेले साथ आए जो यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो
Gulzar
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