nazmKuch Alfaaz

सहीह कह रहे हो शिकायत बजा है तुम्हारी घने गर्द चेहरे तुम्हारे नहीं हैं ख़िज़ाँ-ज़ादे शहरों का रुख़ कर रहे हैं गुलाबी हरे नीले पीले सभी रंग मौसम उड़ा ले गया है कोई धानी चुनरी हवा से नहीं खेलती है कहानी सुनाओ किसी वक़्त भी कि दिन रात की क़ैद बाक़ी नहीं है सुना है मुसाफ़िर कोई रास्ता अब नहीं भूलता सही कह रहे हो कि ये मसअला भी तुम्हारा नहीं है

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"एक बात'" क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को उन सब बातों को जो दबी रहती हैं तुम्हारी पलकों की क़तारों में तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे या तब, जब बस यूँँ ही मुस्कुरा देती हो मुझ सेे बात करते-करते और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं और कहते कहते रुक जाया करते हैं एक बात नहीं बताई तुम्हें के तब मैं चुपके से पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा कहता कुछ नहीं हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी हज़ारों सवालात भी तुम्हारी ही तरह फिर क्यूँँ जवाब नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को कि तुम भी पढ़ लो वो बातें जिन में होंठ ख़ामोश रहते हैं और वो सारी बातें जो अब तक नहीं कही तुम सेे या मुझे भी सिखा दो अपना आँखों से झूठ बोलने का हुनर

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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फिर इक जम्म-ए-ग़फ़ीर एक मैदान में आसमाँ की तरफ़ देर से तक रहा है! इमरा-उल-क़ैस की बेटियाँ शा'इरी की ज़बाँ फिर समझने लगीं लपलपाती ज़बानें ख़िताबत का जादू जगाने लगीं वो ख़ुदा-ज़ादियाँ मुस्कुराने लगीं और मेलों में फिर भीड़ बढ़ने लगी कोई मिम्बर से बोला कि ऐ मेरे प्यारो! तुम्हें अपने अगलों की 'उम्रें लगें बाज़ आओ सफ़र से कुछ आराम लो क़ाफ़िलों की मधुर घंटियाँ रेत के सिलसिले उस की देंगे गवाही तुम्हें हम ने पहले कहा था घरों में रहो तुम न माने तो उस की सज़ा पा चुके बाज़ आओ अभी वक़्त है बे-कराँ नीली नीली ख़ला फिर न मसहूर कर दे तुम्हें

Aashufta Changezi

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मुसाफ़िर हुए फिर इक अंधे सफ़र के पता तय-शुदा मौसमों का कहीं खो गया है बड़े शहर के इक क्लब में दीवाली मनाते हुए कल किसी ने कहा था सिनेमा के पर्दे कई तीज त्यौहार मेले समेटे हुए हैं तुम्हें फ़िक्र कैसी ये क्यूँँ रंग चेहरे का फीका पड़ा है तुम्हीं सुस्त क़दमों पे नादिम हुए थे तुम्हीं को हवस थी कि रफ़्तार क़ाबू में कर लें ख़लाएँ खंगालें गए मौसमों का जनाज़ा उठाए कहाँ जा रहे हो कोई इब्न-ए-मरयम न हाथ आ सकेगा चलो उस को मिट्टी के नीचे दबा दें यही आने वालों के हक़ में मुनासिब रहेगा

Aashufta Changezi

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ख़ुदा-ए-लम-यज़ल की बारगाह में सर-ब-सुजूद! अना की चौखटों में जुड़े चेहरों वाले लोग पेशानियों पर ग़ट्टे डालने में मसरूफ़ हैं आटे में सनी मुट्ठियाँ उन की बख़्शिश की ज़मानत हैं ये कौन सी जन्नत-ए-नईम है जिस का रास्ता चि यूँँटियों की बाँबी से हो कर गुज़रता है दरबानों और कुत्तों को खुली आज़ादी है 'जागते रहो' की सदाएँ इनायतों का ख़िराज वसूल करते नहीं थकती हैं सर्कस का पंडाल खचा-खच भरा है मेम्नों के बाड़े में सहमा-दुबका…घास खाता शे'र कैसा बे-ज़रर दिखाई देता है बौनों की उछल-कूद फ़लक-शगाफ़ क़हक़हे…मुसलसल क़हक़हे तालियों की गूँज! महल-सारा के बंद फाटक को छू कर लौट आती है बस्ती के जहाँ-दीदा बूढ़े फ़रियादी मातम करते पंडाल से रवाना हो जाते हैं

Aashufta Changezi

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डाइरी के ये सादा वरक़ और क़लम छीन लो आईनों की दुकानों में सब अपने चेहरे लिए इक बरहना तबस्सुम के मोहताज हैं सर्द बाज़ार में एक भी चाहने वाला ऐसा नहीं जो उन्हें ज़िंदगी का सबब बख़्श दे धुँद से जगमगाते हुए शहर की बत्तियाँ सज्दा करती हुई कहकशाँ ख़ूब-सूरत ख़ुदाओं की फिरती हुई टोलियाँ ऐसा लगता है सब एक मुद्दत से परछाइयों को पकड़ने में मसरूफ़ हैं!!!

Aashufta Changezi

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दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ नशीली काली बदलियाँ शराबियों की टोलियाँ नशा बढ़ाती धानी धानी चुनरियाँ महकते कुँवारे जिस्म चिलमनों की तीलियाँ सजीली रेशमी परों में रंग-बिरंगी तितलियाँ पकी पकाई औरतों में शहवतों की बिजलियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ थके थकाए जिस्म हाँफती लटकती छातियाँ शफ़ीक़ आँखें माँओं की रहीम लोरियाँ ख़िज़ाँ लुटाती कहकशाँ, धुआँ उगलती चिमनियाँ धड़कते दिल, निढाल जिस्म, धूप के मकाँ सुनहरे सुर्ख़ पैरहन भिगोती शहर-ज़ादियाँ गदेले गंदे पोखरों में तैरती हैं मछलियाँ न जाने किस गुनाह की सज़ा में बहती नदियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ

Aashufta Changezi

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