nazmKuch Alfaaz

बहुत ही तेज़ बारिश है हवा भी कुछ इस तूफ़ानी मुसलसल आसमाँ कई घंटे से यकसाँ बरसता जा रहा है और मिरी खिड़की पे बैठा एक कव्वा पँख से टपकाता पानी आसमाँ की नक़्ल करता जा रहा है और इस से कुछ परे छप्पर पे कोई आदमी-ज़ादा छुपाए सर को पोली-थीन से अपना छुपाता सर वो छप्पर का भी पोली-थीन से बिल्कुल अनोखा लग रहा है

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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आज फिर मुझ से मिरा कमरा मुख़ातिब है दराड़ें वो कभी छत की दिखाता है कभी दीवार में पड़ते शिगाफ़ों को निशाँ झुलसे हुए रंगों का मुझ को मुब्तिला कर देता है हैबत में मकड़ी के सुबुक जाले हवा के दोश पर लहराने लगते हैं ज़वाल-ए-ज़िंदगी का वो पता भी देने लगते हैं ज़मीं कमरे की बोसीदा कहानी जब सुनाती है किवाड़ों से सदा उठती है रोने और सिसकने की कभी आहें सी भरने कि उन्हीं लम्हों के साए में मगर कुछ झाँकती अँगूर की बेलें दरीचे से तबस्सुम का शगुफ़्ता अक्स दिखलाती हैं आँखों को

Jafar Sahni

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मेरे ग़म में शरीक होने और मुझे दिलासा देने को कई दिनों से मिरे अज़ीज़-ओ-आश्ना चले आते हैं वो गुलू-गीर आवाज़ों और भीगी पलकों से अपने ग़म का जब इज़हार करते हैं तो मैं भी चेहरे पर इक मुखौटा चढ़ा लेता हूँ उन की दिल-जूई की ख़ातिर लम्हा-भर को उदास हो जाता हूँ

Jafar Sahni

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वापसी पर रात के काले सियह झूले में लेटे उस ने सोचा था कि वो भी दूसरों की तरह हँसती गुनगुनाती ज़िंदगी से उन्स की दहलीज़ पर जा कर मिलेगा पूछेगा उस से किरन सूरज की कैसे चूमती है फूल को और जगमगा देती है मिट्टी धूल को ठंडी हवा क्या है घटा क्या है परिंदे चहचहाते किस अदास हैं मगर कुछ भी हुआ ऐसा नहीं वो आज भी वीरान खिड़की से उड़ा कर ख़्वाब की सब राख जलती धूप को सर पर समेटे अंधे बहरे गूँगे एहसासात से ममलू सफ़र पर गामज़न फिर हो गया है और उस की सोच बिल्कुल बाँझ सी लगने लगी है

Jafar Sahni

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ख़्वाब की सीढ़ियाँ लम्हा लम्हा उतरता हुआ और चढ़ता हुआ धूप बादल में लोटें लगाता हुआ फूल से ख़ार से वो गुज़रता हुआ आरज़ू की थकन तिश्नगी की शिकन दिल पे मजमा किए आज आँगन के तारीक गोशे में अम्बार पर कूड़े के ज़ंग-आलूद इक क़ुफ़्ल सा रह गया है कलीद-ए-वफ़ा से नहीं जिस का कोई भी नाता

Jafar Sahni

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मुख़्तसर कमरे की एक छोटी सी मग़्मूम खिड़की कभी देखती है जो बाहर की दुनिया उदासी बहुत बढ़ जाती है उस की मगर सामने के हरे लॉन के फूल चम्पा चमेली गुलाब और बेला की पोशाक पहने हुए मुस्कुराते हुए रंग ओ ख़ुशबू के लहजे में उस को सुनाते हैं मासूम लम्हों का क़िस्सा हथेली पे फिर इन्ही मासूम लम्हों की तहरीर करती है दिलकश हँसी एक चहकार कोयल की और जब मोहब्बत की उँगली नज़ाकत से था में ख़िरामाँ ख़िरामाँ अनोखा सा इक फूल इस लॉन पर 'मीर' के शे'र कि पंखुड़ी चुनने लगता है तब वक़्त के क़हक़हों का बहुत ख़ुशनुमा सिलसिला ठहर जाता है इस मुख़्तसर कमरे की छोटी सी खिड़की में

Jafar Sahni

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