बहुत ही तेज़ बारिश है हवा भी कुछ इस तूफ़ानी मुसलसल आसमाँ कई घंटे से यकसाँ बरसता जा रहा है और मिरी खिड़की पे बैठा एक कव्वा पँख से टपकाता पानी आसमाँ की नक़्ल करता जा रहा है और इस से कुछ परे छप्पर पे कोई आदमी-ज़ादा छुपाए सर को पोली-थीन से अपना छुपाता सर वो छप्पर का भी पोली-थीन से बिल्कुल अनोखा लग रहा है
Related Nazm
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
160 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
107 likes
दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
66 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
More from Jafar Sahni
आज फिर मुझ से मिरा कमरा मुख़ातिब है दराड़ें वो कभी छत की दिखाता है कभी दीवार में पड़ते शिगाफ़ों को निशाँ झुलसे हुए रंगों का मुझ को मुब्तिला कर देता है हैबत में मकड़ी के सुबुक जाले हवा के दोश पर लहराने लगते हैं ज़वाल-ए-ज़िंदगी का वो पता भी देने लगते हैं ज़मीं कमरे की बोसीदा कहानी जब सुनाती है किवाड़ों से सदा उठती है रोने और सिसकने की कभी आहें सी भरने कि उन्हीं लम्हों के साए में मगर कुछ झाँकती अँगूर की बेलें दरीचे से तबस्सुम का शगुफ़्ता अक्स दिखलाती हैं आँखों को
Jafar Sahni
0 likes
मेरे ग़म में शरीक होने और मुझे दिलासा देने को कई दिनों से मिरे अज़ीज़-ओ-आश्ना चले आते हैं वो गुलू-गीर आवाज़ों और भीगी पलकों से अपने ग़म का जब इज़हार करते हैं तो मैं भी चेहरे पर इक मुखौटा चढ़ा लेता हूँ उन की दिल-जूई की ख़ातिर लम्हा-भर को उदास हो जाता हूँ
Jafar Sahni
0 likes
वापसी पर रात के काले सियह झूले में लेटे उस ने सोचा था कि वो भी दूसरों की तरह हँसती गुनगुनाती ज़िंदगी से उन्स की दहलीज़ पर जा कर मिलेगा पूछेगा उस से किरन सूरज की कैसे चूमती है फूल को और जगमगा देती है मिट्टी धूल को ठंडी हवा क्या है घटा क्या है परिंदे चहचहाते किस अदास हैं मगर कुछ भी हुआ ऐसा नहीं वो आज भी वीरान खिड़की से उड़ा कर ख़्वाब की सब राख जलती धूप को सर पर समेटे अंधे बहरे गूँगे एहसासात से ममलू सफ़र पर गामज़न फिर हो गया है और उस की सोच बिल्कुल बाँझ सी लगने लगी है
Jafar Sahni
0 likes
ख़्वाब की सीढ़ियाँ लम्हा लम्हा उतरता हुआ और चढ़ता हुआ धूप बादल में लोटें लगाता हुआ फूल से ख़ार से वो गुज़रता हुआ आरज़ू की थकन तिश्नगी की शिकन दिल पे मजमा किए आज आँगन के तारीक गोशे में अम्बार पर कूड़े के ज़ंग-आलूद इक क़ुफ़्ल सा रह गया है कलीद-ए-वफ़ा से नहीं जिस का कोई भी नाता
Jafar Sahni
0 likes
मुख़्तसर कमरे की एक छोटी सी मग़्मूम खिड़की कभी देखती है जो बाहर की दुनिया उदासी बहुत बढ़ जाती है उस की मगर सामने के हरे लॉन के फूल चम्पा चमेली गुलाब और बेला की पोशाक पहने हुए मुस्कुराते हुए रंग ओ ख़ुशबू के लहजे में उस को सुनाते हैं मासूम लम्हों का क़िस्सा हथेली पे फिर इन्ही मासूम लम्हों की तहरीर करती है दिलकश हँसी एक चहकार कोयल की और जब मोहब्बत की उँगली नज़ाकत से था में ख़िरामाँ ख़िरामाँ अनोखा सा इक फूल इस लॉन पर 'मीर' के शे'र कि पंखुड़ी चुनने लगता है तब वक़्त के क़हक़हों का बहुत ख़ुशनुमा सिलसिला ठहर जाता है इस मुख़्तसर कमरे की छोटी सी खिड़की में
Jafar Sahni
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jafar Sahni.
Similar Moods
More moods that pair well with Jafar Sahni's nazm.







