nazmKuch Alfaaz

मुख़्तसर कमरे की एक छोटी सी मग़्मूम खिड़की कभी देखती है जो बाहर की दुनिया उदासी बहुत बढ़ जाती है उस की मगर सामने के हरे लॉन के फूल चम्पा चमेली गुलाब और बेला की पोशाक पहने हुए मुस्कुराते हुए रंग ओ ख़ुशबू के लहजे में उस को सुनाते हैं मासूम लम्हों का क़िस्सा हथेली पे फिर इन्ही मासूम लम्हों की तहरीर करती है दिलकश हँसी एक चहकार कोयल की और जब मोहब्बत की उँगली नज़ाकत से था में ख़िरामाँ ख़िरामाँ अनोखा सा इक फूल इस लॉन पर 'मीर' के शे'र कि पंखुड़ी चुनने लगता है तब वक़्त के क़हक़हों का बहुत ख़ुशनुमा सिलसिला ठहर जाता है इस मुख़्तसर कमरे की छोटी सी खिड़की में

Related Nazm

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा

ALI ZUHRI

9 likes

तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

24 likes

राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

73 likes

"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को

Anand Raj Singh

9 likes

More from Jafar Sahni

आज फिर मुझ से मिरा कमरा मुख़ातिब है दराड़ें वो कभी छत की दिखाता है कभी दीवार में पड़ते शिगाफ़ों को निशाँ झुलसे हुए रंगों का मुझ को मुब्तिला कर देता है हैबत में मकड़ी के सुबुक जाले हवा के दोश पर लहराने लगते हैं ज़वाल-ए-ज़िंदगी का वो पता भी देने लगते हैं ज़मीं कमरे की बोसीदा कहानी जब सुनाती है किवाड़ों से सदा उठती है रोने और सिसकने की कभी आहें सी भरने कि उन्हीं लम्हों के साए में मगर कुछ झाँकती अँगूर की बेलें दरीचे से तबस्सुम का शगुफ़्ता अक्स दिखलाती हैं आँखों को

Jafar Sahni

0 likes

शफ़क़ जब फूल कर रंग-ए-हिना थी और हवा के लब सिले थे एक बूढ़ा पेड़ बरगद का खड़ा गँगा-किनारे दिल-गिरफ़्ता ख़ुद से महव-ए-गुफ़्तुगू था ''वो मिरी इक शाख़ का पत्ता मिरे ही जिस्म का हिस्सा गिरा गिर कर सितारा हो गया पानी का प्यारा हो गया मुझ से किनारा हो गया'' वहीं सरगोशियों में इक पतिंगा गुनगुनाया कान में उस के निराशा तुम में क्यूँँ जागी मिरे बाबा? तुम्हारे अंग के कितने ही पत्ते अब भी गुन गाते तुम्हारा हैं सहारा तुम बनो उन का तुम्हारा वो सहारा हैं न इक पत्ते को रो बाबा!

Jafar Sahni

0 likes

मेरे ग़म में शरीक होने और मुझे दिलासा देने को कई दिनों से मिरे अज़ीज़-ओ-आश्ना चले आते हैं वो गुलू-गीर आवाज़ों और भीगी पलकों से अपने ग़म का जब इज़हार करते हैं तो मैं भी चेहरे पर इक मुखौटा चढ़ा लेता हूँ उन की दिल-जूई की ख़ातिर लम्हा-भर को उदास हो जाता हूँ

Jafar Sahni

0 likes

बहुत ही तेज़ बारिश है हवा भी कुछ इस तूफ़ानी मुसलसल आसमाँ कई घंटे से यकसाँ बरसता जा रहा है और मिरी खिड़की पे बैठा एक कव्वा पँख से टपकाता पानी आसमाँ की नक़्ल करता जा रहा है और इस से कुछ परे छप्पर पे कोई आदमी-ज़ादा छुपाए सर को पोली-थीन से अपना छुपाता सर वो छप्पर का भी पोली-थीन से बिल्कुल अनोखा लग रहा है

Jafar Sahni

0 likes

वापसी पर रात के काले सियह झूले में लेटे उस ने सोचा था कि वो भी दूसरों की तरह हँसती गुनगुनाती ज़िंदगी से उन्स की दहलीज़ पर जा कर मिलेगा पूछेगा उस से किरन सूरज की कैसे चूमती है फूल को और जगमगा देती है मिट्टी धूल को ठंडी हवा क्या है घटा क्या है परिंदे चहचहाते किस अदास हैं मगर कुछ भी हुआ ऐसा नहीं वो आज भी वीरान खिड़की से उड़ा कर ख़्वाब की सब राख जलती धूप को सर पर समेटे अंधे बहरे गूँगे एहसासात से ममलू सफ़र पर गामज़न फिर हो गया है और उस की सोच बिल्कुल बाँझ सी लगने लगी है

Jafar Sahni

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jafar Sahni.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jafar Sahni's nazm.