वापसी पर रात के काले सियह झूले में लेटे उस ने सोचा था कि वो भी दूसरों की तरह हँसती गुनगुनाती ज़िंदगी से उन्स की दहलीज़ पर जा कर मिलेगा पूछेगा उस से किरन सूरज की कैसे चूमती है फूल को और जगमगा देती है मिट्टी धूल को ठंडी हवा क्या है घटा क्या है परिंदे चहचहाते किस अदास हैं मगर कुछ भी हुआ ऐसा नहीं वो आज भी वीरान खिड़की से उड़ा कर ख़्वाब की सब राख जलती धूप को सर पर समेटे अंधे बहरे गूँगे एहसासात से ममलू सफ़र पर गामज़न फिर हो गया है और उस की सोच बिल्कुल बाँझ सी लगने लगी है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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आज फिर मुझ से मिरा कमरा मुख़ातिब है दराड़ें वो कभी छत की दिखाता है कभी दीवार में पड़ते शिगाफ़ों को निशाँ झुलसे हुए रंगों का मुझ को मुब्तिला कर देता है हैबत में मकड़ी के सुबुक जाले हवा के दोश पर लहराने लगते हैं ज़वाल-ए-ज़िंदगी का वो पता भी देने लगते हैं ज़मीं कमरे की बोसीदा कहानी जब सुनाती है किवाड़ों से सदा उठती है रोने और सिसकने की कभी आहें सी भरने कि उन्हीं लम्हों के साए में मगर कुछ झाँकती अँगूर की बेलें दरीचे से तबस्सुम का शगुफ़्ता अक्स दिखलाती हैं आँखों को
Jafar Sahni
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मेरे ग़म में शरीक होने और मुझे दिलासा देने को कई दिनों से मिरे अज़ीज़-ओ-आश्ना चले आते हैं वो गुलू-गीर आवाज़ों और भीगी पलकों से अपने ग़म का जब इज़हार करते हैं तो मैं भी चेहरे पर इक मुखौटा चढ़ा लेता हूँ उन की दिल-जूई की ख़ातिर लम्हा-भर को उदास हो जाता हूँ
Jafar Sahni
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शफ़क़ जब फूल कर रंग-ए-हिना थी और हवा के लब सिले थे एक बूढ़ा पेड़ बरगद का खड़ा गँगा-किनारे दिल-गिरफ़्ता ख़ुद से महव-ए-गुफ़्तुगू था ''वो मिरी इक शाख़ का पत्ता मिरे ही जिस्म का हिस्सा गिरा गिर कर सितारा हो गया पानी का प्यारा हो गया मुझ से किनारा हो गया'' वहीं सरगोशियों में इक पतिंगा गुनगुनाया कान में उस के निराशा तुम में क्यूँँ जागी मिरे बाबा? तुम्हारे अंग के कितने ही पत्ते अब भी गुन गाते तुम्हारा हैं सहारा तुम बनो उन का तुम्हारा वो सहारा हैं न इक पत्ते को रो बाबा!
Jafar Sahni
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बहुत नर्म-ओ-नाज़ुक हसीं पँख वाली परेशान तितली कभी पत्ते छू कर कभी चूम कर फूल राह-ए-बक़ा ढूँडने में लगी थी किरन आफ़्ताबी थी देती दिलासा हवा भी थपकती थी शफ़क़त से उस को कि इतने में इंसान-ज़ादा कोई चुपके से अपनी चुटकी में ले कर बड़े प्यार से इस हसीं पँख वाली परेशान तितली को दिखला गया है फ़ना का इलाक़ा
Jafar Sahni
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मुझ को वो कुत्ता सबा क़दमों उछलता मख़मली सब्ज़े पे तोहफ़ा हुस्न-ए-मुत्लक़ का बना दिल-कश लगा था लम्बे बालों रुई के गालों को पहने जिस्म इस का गेंद सा लगने लगा था इक गुलाबी नर्म उँगली नर्म पट्टा हल्की सी ज़ंजीर वो कुत्ता बहुत अच्छा लगा था हाँ मगर वो गेंद सा कुत्ता उछलता भी अचानक एक पत्थर के सिरे पर सूँघता कुछ रुक गया और आम कुत्तों की तरह इक टाँग अपनी जब उठा कर हस्ब-ए-ख़स्लत कर गया ग़ारत तमाशा हो गया
Jafar Sahni
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