"शिकवा" दिल तो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया है फिर कैसा ये शिकवा गिला रह गया घर का कोना कोना फूँक दिया हम ने भला आईना ये कैसे बचा रह गया रौशनी बन संग तुम्हारे चलूँगा कभी वो जो कहता था मैं भी जलूँगा कभी जा कर देखे कोई उस दिए को ज़रा वो दिया तो बुझा का बुझा रह गया
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"फुटपाथ" चल सकता नहीं जिस्म, मचलता है जज़्बात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ सुख की घटा नहीं छाती, हँसी के बादल नहीं आते बाबा, देखो ना मेरे हिस्से में ख़ुशी के पल नहीं आते अब हर पल इन आँखों से होती ग़मों की बरसात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ
Vikas Sangam
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"शिकश्त" जहाँ बल पड़ते हैं सोच के, वहाँ सुकूँ क्या लिखें अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखे शिकश्त ही सही, शिकश्त से मोहब्बत कर ली हम ने विजय प्रिय नहीं हमें, विजय से बग़ावत कर ली हम ने जहाँ फूटते हैं अँगारे जिस्मों में, वहाँ लहू क्या लिखें अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखें
Vikas Sangam
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"मेरे साथिया" कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन ना रातें बीते ना ही दिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन तुझी से थे ग़म तुुझी से थी ख़ुशी मेरी तूँ ही नहीं तो तबाह है ज़िन्दगी मेरी तूँ चाहत, तूँ हसरत, है तू ही मोहब्बत बिन तेरे जानम बर्बाद आशिक़ी मेरी हर ख़ुशी गई मुझ सेे छीन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन
Vikas Sangam
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"भूला न देना" सुनो, बदलते वक़्त के साथ तुम बदल तो नहीं जाओगी तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी वो अपनी मुलाक़ातें, वो देर तक फोन पर बातें साथ हँसना, साथ रोना, रूठना, मनाना तुम भूल तो नहीं जाओगी पता है! हम एक-दूसरे के कभी नहीं हो सकते लेकिन ये तो बा'द की बात है नहम एक-दूसरे के हो चुके हैं, है न? पता है, जो आज है कल नहीं होगा एक दिन ये साथ छुट जाएँगे उम्मीदों के धागे टूट जाएँगे तन कहीं और मन कहीं होगा यादों के सिवा कुछ नहीं होगा पता है, जो आज है कल नहीं होगा अक़्श आँखों से मिटा न सकूँगा चाह कर भी तुम्हें भूला न सकूँगा कैसे यक़ीं दिलाऊँ तुम्हें तुम मुझे बहुत याद आओगी सुनो, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी
Vikas Sangam
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"चुप्पियाँ" तेरी ख़ामोशियाँ तड़पाती हैं मुझे ये उदासियाँ सताती हैं मुझे ग़म-ए-दिल का सहारा नहीं है अब तेरा चुप रहना गवारा नहीं है जब तक तुझे मैं सुन सकता हूँ तेरे अल्फ़ाज़ मैं चुन सकता हूँ अब सीने से लगा ले मुझे ये चुप्पियाँ मार न डाले मुझे ये तन्हाइयाँ खलती हैं दिल में बेचैनियाँ पलती हैं कुछ बोल
Vikas Sangam
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