हज़ारों सदियाँ गुज़र चुकी हैं किसी समय में वो थी सतवंती कहीं सावित्री कहीं थी मीरा हर एक युग में अक़ीदतों की लहर में भीगी तपस्या के सेहर में गुम-सुम रिवायतों के नशे में डूबी तुम्हारे क़दमों की गर्द को वो तिलक बनाती दिए जलाती थी नक़्श-ए-पा पर जनम जनम का अटूट रिश्ता निबाहे जाती हज़ारों सदियों सफ़र किया है नज़र जमाए तुम्हारे पीछे तुम्हारे दुख पर दुखी हुई है तुम्हारे सुख पर सुखी हुई है मगर बताओ हज़ारों सदियों के दरमियाँ कोई ऐसा लम्हा जो तुम ने इस के लिए जिया हो सिवाए आँसू के कोई जुगनू कभी जो आँचल में जड़ दिया हो पुराने बरगद पे एक धागा कहीं तो उस के भी नाम का हो अँधेरी ताक़ों पे उस की ख़ातिर रखा हुआ भी तो इक दिया हो नहीं है कुछ भी कहीं नहीं है वो अपनी तारीख़ में तुम्हारा लिखे भी गर नाम किस तरह से
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे
Gorakh Pandey
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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शाकाहारी गोश्त मछली अंडे नहीं खाते कि भ्रष्ट न हो जाए धर्म मगर खेतों में हमारी लाशें दबा कर सब्ज़ियाँ उगाते हैं हमारे ही लहू की नमी से करते हैं पटवन शाकाहारी मांसाहारी जो नहीं होते
Kahkashan Tabassum
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बहुत सी नज़्में कही थीं मैं ने लिखें भी लिख लिख के फाड़ डालें जो शायद नाज़ुक तब्अ' पे तेरी गराँ गुज़रतीं कि जानती थी वो सारे मौसम जो तेरे अंदर हैं आते जाते परख चुकी थी मैं तेरे दिल की तमाम रुत को मैं तेरी सोचों से आश्ना थी इसी लिए तो बहुत सी नज़्में कही थीं लेकिन
Kahkashan Tabassum
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वो दर्द भी था सिवा हदों से तुम्हारी आमद का जिस में मुज़्दा छुपा हुआ था वो दर्द रग रग की चीख़ बन कर सदा हुआ था तो आँख ख़ुशियों से नम हुई थी ज़बाँ से शुक्र-ए-ख़ुदा था निकला ज़मीं का टुकड़ा जो ज़ेर-ए-पा था हुआ था जन्नत कि अपनी तकमील पर हुई थी मैं सर-ब-सज्दा मगर मिरी जाँ वो ख़्वाब मौसम गुज़र चुका है हज़ार रातों के रतजगों का हिसाब कैसा जिसे कि अपने लहू से सींचा शजर बनाया वो मेरा कब था अज़ाब कैसे उतर रहे हैं या ख़्वाब आँखों में मर रहे हैं रफ़ाक़तों में ये हिजरतों की महक घुली क्यूँँ मसाफ़तों में थकन सी क्यूँँ जिस्म-ओ-जाँ में उतरी कोई बताए कि गोद भरने के बा'द ख़ाली ये हाथ क्यूँँ हैं ये कैसा चेहरा है ज़िंदगी का लबों पे हर्फ़-ए-दुआ है साकित मैं फिर से इक बार दर्द लहरों की ज़द पे ठहरी ये सोचती हूँ कि जिस को बनने में उम्र काटी वो ख़्वाब-ए-मौसम गुज़र चुके हैं ग़ुबार आँखों में भर चुके हैं नवेद देता हो कोई लम्हा कोई पुकारे कि मैं यहीं हूँ पलट के आएँ वो पाँव जिस के लिए ज़मीं हूँ नहीं है कोई सदा नहीं है मगर मिरी जाँ ये दर्द अब के सिवा है हद से
Kahkashan Tabassum
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ये तिरी शक्ल है कि चाँद का रौशन चेहरा ये सितारे तिरी आँखों से दमकते क्यूँँ हैं ये तिरी शोख़ अदाओं सी सनकती पुर्वा जो मिरे सर से दुपट्टे को गिरा देती है ख़ुश्क बालों को ज़रा और उड़ा देती है ये तिरी याद के जुगनू हैं कि शबनम क़तरे जिस से बे-ख़्वाब निगाहों की ज़मीं गीली है कोई आहट न ही दस्तक कि गली सूनी है गर मुझे वक़्त के तेवर का पता जो होता घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाने देती सारे दरवाज़ों दरीचों को मुक़फ़्फ़ल रखती सूनी आँखों में छुपा लेती मैं काजल की तरह अपनी बाँहों के हिसारों में मुक़य्यद रखती मिरे बच्चे जो मुझे काश ख़बर ये होती एक दो पल में मिरा शहर है जलने वाला
Kahkashan Tabassum
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हमें ख़ानों में मत बाँटो कि हम तो रौशनी ठहरे किसी दहलीज़ पर जलते हुए शब भर किसी का रास्ता तकते चराग़ों से भी आगे है जहाँ अपना उजालों की कुमक ले कर अंधेरे की सफ़ों को चीर जाते हैं ये जुगनू चाँद और तारे हमारी सूरतें जैसे हमें ख़ानों में मत बाँटो हवा हैं हम भला दीवार-ओ-दर में क़ैद क्या होंगे सुनहरी सुब्ह ढलती शाम की राहत हमीं से है हमें मीज़ान पर रखने से पहले तोलने से क़ब्ल इतना सोच लेना है हमारा बोझ तेरी बंद मुट्ठी में दबी रस्सी उठाएगी भला कैसे कि हम तो शश-जिहत में जिस तरफ़ नज़रें उठाओ देख लो फैली हुई बिखरी हुई हम को कि हम तो ज़िंदगी हैं
Kahkashan Tabassum
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