हमें ख़ानों में मत बाँटो कि हम तो रौशनी ठहरे किसी दहलीज़ पर जलते हुए शब भर किसी का रास्ता तकते चराग़ों से भी आगे है जहाँ अपना उजालों की कुमक ले कर अंधेरे की सफ़ों को चीर जाते हैं ये जुगनू चाँद और तारे हमारी सूरतें जैसे हमें ख़ानों में मत बाँटो हवा हैं हम भला दीवार-ओ-दर में क़ैद क्या होंगे सुनहरी सुब्ह ढलती शाम की राहत हमीं से है हमें मीज़ान पर रखने से पहले तोलने से क़ब्ल इतना सोच लेना है हमारा बोझ तेरी बंद मुट्ठी में दबी रस्सी उठाएगी भला कैसे कि हम तो शश-जिहत में जिस तरफ़ नज़रें उठाओ देख लो फैली हुई बिखरी हुई हम को कि हम तो ज़िंदगी हैं
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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शाकाहारी गोश्त मछली अंडे नहीं खाते कि भ्रष्ट न हो जाए धर्म मगर खेतों में हमारी लाशें दबा कर सब्ज़ियाँ उगाते हैं हमारे ही लहू की नमी से करते हैं पटवन शाकाहारी मांसाहारी जो नहीं होते
Kahkashan Tabassum
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बहुत सी नज़्में कही थीं मैं ने लिखें भी लिख लिख के फाड़ डालें जो शायद नाज़ुक तब्अ' पे तेरी गराँ गुज़रतीं कि जानती थी वो सारे मौसम जो तेरे अंदर हैं आते जाते परख चुकी थी मैं तेरे दिल की तमाम रुत को मैं तेरी सोचों से आश्ना थी इसी लिए तो बहुत सी नज़्में कही थीं लेकिन
Kahkashan Tabassum
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ये तिरी शक्ल है कि चाँद का रौशन चेहरा ये सितारे तिरी आँखों से दमकते क्यूँँ हैं ये तिरी शोख़ अदाओं सी सनकती पुर्वा जो मिरे सर से दुपट्टे को गिरा देती है ख़ुश्क बालों को ज़रा और उड़ा देती है ये तिरी याद के जुगनू हैं कि शबनम क़तरे जिस से बे-ख़्वाब निगाहों की ज़मीं गीली है कोई आहट न ही दस्तक कि गली सूनी है गर मुझे वक़्त के तेवर का पता जो होता घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाने देती सारे दरवाज़ों दरीचों को मुक़फ़्फ़ल रखती सूनी आँखों में छुपा लेती मैं काजल की तरह अपनी बाँहों के हिसारों में मुक़य्यद रखती मिरे बच्चे जो मुझे काश ख़बर ये होती एक दो पल में मिरा शहर है जलने वाला
Kahkashan Tabassum
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हज़ारों साल बीते मिरी ज़रख़ेज़ धरती के सिंघासन पर बिराजे देवताओं के सरापे साँवले थे मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र ऊँचा था हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई बृन्दाबन की धरती पर थिरकती नाचती राधा बसी थी कृष्ण के दिल में उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला हज़ारों साल बीते मगर अब भी हमारी साँवली रंगत तिरा वरदान हो गोया हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो किसी राधा का अंधा ख़्वाब आँखों में बसाए लिए कश्कोल हाथों में फिरे बस्ती की गलियों में हम अब किस ज़ो'म में पूजा की थाली में दिए रख कर तिरी चौखट पे आएँ सर झुकाएँ उतारें आरती तेरी हमारे बख़्त पर तेरा ये श्यामल रंग इक आसेब की सूरत मुसल्लत है हम अब तो डर के मारे आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं
Kahkashan Tabassum
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हज़ारों साल बीते मिरी ज़रख़ेज़ धरती के सिंघासन पर बिराजे देवताओं के सरापे साँवले थे मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र ऊँचा था हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई बृन्दाबन की धरती पर थिरकती नाचती राधा बसी थी कृष्ण के दिल में उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला हज़ारों साल बीते मगर अब भी हमारी साँवली रंगत तिरा वरदान हो गोया हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो किसी राधा का अंधा ख़्वाब आँखों में बसाए लिए कश्कोल हाथों में फिरे बस्ती की गलियों में हम अब किस ज़ो'म में पूजा की थाली में दिए रख कर तिरी चौखट पे आएँ सर झुकाएँ उतारें आरती तेरी हमारे बख़्त पर तेरा ये श्यामल रंग इक आसेब की सूरत मुसल्लत है हम अब तो डर के मारे आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं
Kahkashan Tabassum
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