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हज़ारों साल बीते मिरी ज़रख़ेज़ धरती के सिंघासन पर बिराजे देवताओं के सरापे साँवले थे मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र ऊँचा था हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई बृन्दाबन की धरती पर थिरकती नाचती राधा बसी थी कृष्ण के दिल में उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला हज़ारों साल बीते मगर अब भी हमारी साँवली रंगत तिरा वरदान हो गोया हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो किसी राधा का अंधा ख़्वाब आँखों में बसाए लिए कश्कोल हाथों में फिरे बस्ती की गलियों में हम अब किस ज़ो'म में पूजा की थाली में दिए रख कर तिरी चौखट पे आएँ सर झुकाएँ उतारें आरती तेरी हमारे बख़्त पर तेरा ये श्यामल रंग इक आसेब की सूरत मुसल्लत है हम अब तो डर के मारे आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"तारीख़ क्या है" सुब्ह रौशन थी और गर्मियों के थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नेहरों में गोते लगाते अपने चेहरे पे कीचड़ लगा कर डराते थे एक दूसरे को किनारो पे बैठे हुए हम ने जो अहद एक दूसरे से लिए थे उस के धुंधले से नक़्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक़्श हैं ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार कर के हमारी तरफ़ भेजता था और हम साया-ए-कुफ्र में एक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका, उस का चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनात में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफीम नज़्मों में करता, कि जिस पर बज़िद ने ये बीमार जिन्न को ख़ुद अपनी तमन्नों की आत्माओं ने इतना डराया के इनको हवस के कफ़स में मोहब्बत की किरणों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस सेे परे हो गए इन के बस में नहीं कि ये महसूस करते इक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स, जिस सेे इनकार कर कर के इन के बदन खुरदरे हो गए एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की इक किस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते, ख़ुदा और मोहब्बत पे रायज़नी करते थकते नहीं और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इन की मर्ज़ी की नज़्में कहूँ जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़के हैरान हो जिस को ये इल्म कहते हैं, उस इल्म की बात हो, फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साय, समाज, अक़ीदा, ज़बान, माशी मशावात, इंसान के रंग-ओ-आदातों अतवार, ईजाद तकलीद, अम्ल इंतशार, नैनन की अज़मद के क़िस्से, खितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुलहनामा लिए तेज़ रफ़्तार, घोड़ों पे सह में सिपाही, नज़रिया-ए-समावात के काट ने क्या कहा? और उस के जुराबों के फ़ीतों की डिब्बीयाँ, किमीयाँ के ख़जानों का मुँह खोलने वाला बाबल कौन था जिस ने पारे को पत्थर में ढाला और हरशल की आँखें जो बस आसमानों पे रहती, क्या वो इग्लेंड का मोसिन नहीं समुंदर की तक्सीर और एटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ क़श्तियो जैसी क्यूँ हैं? और राफेल के हाथ पर मिट्टी कैसे लगी? ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की पिछले दस साल से उस की आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका, और ये पूछते हैं कि हेगल के नज़दीक तारीख़ क्या है?

Tehzeeb Hafi

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"माँ क्या है?" माँ क्या है? वो झरना है माँ क्या है? वो धरती है माँ क्या है? वो नभ सारा माँ क्या है? बहती धारा माँ क्या है? वो जग सारा माँ क्या है? वो प्यारी है माँ क्या है? वो न्यारी है माँ क्या है? वो बादल है माँ क्या है? हाँ बारिश है माँ क्या है? वो महिमा है माँ क्या है? वो धड़कन है माँ क्या है? वो पूजा है माँ क्या है? वो अर्पण है माँ क्या है? वो दर्पण है माँ क्या है? वो चितवन है माँ क्या है? वो गुलशन है माँ क्या है? वो तनमन है माँ क्या है? वो सावन है माँ क्या है? वो पावन है माँ क्या है? वो मंदिर है माँ क्या है? वो मस्कन है माँ क्या है? वो अपनापन माँ क्या है? मेरी बचपन माँ क्या है? जा की खन खन माँ क्या है? वो दामन है माँ क्या है? वो आंचल है माँ क्या है? वो ख़ुशी है माँ क्या है? वो पागलपन माँ क्या है? सीतल पलना माँ क्या है? मन की आशा माँ क्या है? मेरी भाषा माँ क्या है? वो सोना है माँ क्या है? हाँ हीरा है माँ क्या है? वो मोती है माँ क्या है? डर की कदगन माँ क्या है? दिल की धड़कन माँ क्या है? मन का भटकन माँ क्या है? दिल का बंधन माँ क्या है? जग का दर्शन तू क्या है? बेटा उस का वो क्या है? जीवन मेरी वो क्या है? जीवन मेरी

Raunak Karn

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शाकाहारी गोश्त मछली अंडे नहीं खाते कि भ्रष्ट न हो जाए धर्म मगर खेतों में हमारी लाशें दबा कर सब्ज़ियाँ उगाते हैं हमारे ही लहू की नमी से करते हैं पटवन शाकाहारी मांसाहारी जो नहीं होते

Kahkashan Tabassum

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ये तिरी शक्ल है कि चाँद का रौशन चेहरा ये सितारे तिरी आँखों से दमकते क्यूँँ हैं ये तिरी शोख़ अदाओं सी सनकती पुर्वा जो मिरे सर से दुपट्टे को गिरा देती है ख़ुश्क बालों को ज़रा और उड़ा देती है ये तिरी याद के जुगनू हैं कि शबनम क़तरे जिस से बे-ख़्वाब निगाहों की ज़मीं गीली है कोई आहट न ही दस्तक कि गली सूनी है गर मुझे वक़्त के तेवर का पता जो होता घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाने देती सारे दरवाज़ों दरीचों को मुक़फ़्फ़ल रखती सूनी आँखों में छुपा लेती मैं काजल की तरह अपनी बाँहों के हिसारों में मुक़य्यद रखती मिरे बच्चे जो मुझे काश ख़बर ये होती एक दो पल में मिरा शहर है जलने वाला

Kahkashan Tabassum

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गढ़ो मत चाक पे रख के कोई कूज़ा सुराही या घड़ा प्याला तुम्हारी सोच के ये नक़्श हैं सारे तुम्हारी ख़्वाहिशों के रंग भर दिलकश हमें मिट्टी ही रहने दो हमें कब चाहिए ऐसी अता बख़्शी हुई सूरत हमें मिट्टी ही रहने दो जो नम बारिश से हो ज़रख़ेज़ हो फ़स्लें उगाती हो ज़रा सी बीज को पौदा बनाती हो कि वो पौदा शजर बन कर तुम्हारी रहगुज़र को छाँव देता है वही रस्ता तुम्हारी मंज़िलें आसान करता है हमें मिट्टी ही रहने दो नुमाइश के सजावट के हमें सामान क्यूँँ होना नुमू से क्यूँँ हमें महरूम करते हो तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीं क़ाएम रहे जानाँ हमें मिट्टी ही रहने दो

Kahkashan Tabassum

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वो मुअज़्ज़िन था ज़रा सी देर को आ या था अपने घर ये कहने को कि कोई शोर हो दस्तक हो दरवाज़ा न खोलोगी दरीचे बंद रक्खोगी हवाएँ शहर की बदली हुई हैं यही ताकीद कर के वो वापस हो गया था और अपनी कोठरी में बंद उस की काँपती बीवी कलेजे से लगाए नन्हे बच्चों को किसी सहमी हुई चिड़िया की सूरत पर समेटे दम-ब-ख़ुद बैठी रही न जाने रात के कितने पहर बीते फज्र होने को आई बशारत बाँग की सूरत किसी मुर्ग़े ने दी थी सुब्ह होने की मगर मस्जिद के मिम्बर से बिला-नाग़ा बुलंद होती मोअज़्ज़िन की सदा चुप थी अज़ान-ए-सुब्ह ग़ाएब थी

Kahkashan Tabassum

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बहुत सी नज़्में कही थीं मैं ने लिखें भी लिख लिख के फाड़ डालें जो शायद नाज़ुक तब्अ' पे तेरी गराँ गुज़रतीं कि जानती थी वो सारे मौसम जो तेरे अंदर हैं आते जाते परख चुकी थी मैं तेरे दिल की तमाम रुत को मैं तेरी सोचों से आश्ना थी इसी लिए तो बहुत सी नज़्में कही थीं लेकिन

Kahkashan Tabassum

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