"माँ क्या है?" माँ क्या है? वो झरना है माँ क्या है? वो धरती है माँ क्या है? वो नभ सारा माँ क्या है? बहती धारा माँ क्या है? वो जग सारा माँ क्या है? वो प्यारी है माँ क्या है? वो न्यारी है माँ क्या है? वो बादल है माँ क्या है? हाँ बारिश है माँ क्या है? वो महिमा है माँ क्या है? वो धड़कन है माँ क्या है? वो पूजा है माँ क्या है? वो अर्पण है माँ क्या है? वो दर्पण है माँ क्या है? वो चितवन है माँ क्या है? वो गुलशन है माँ क्या है? वो तनमन है माँ क्या है? वो सावन है माँ क्या है? वो पावन है माँ क्या है? वो मंदिर है माँ क्या है? वो मस्कन है माँ क्या है? वो अपनापन माँ क्या है? मेरी बचपन माँ क्या है? जा की खन खन माँ क्या है? वो दामन है माँ क्या है? वो आंचल है माँ क्या है? वो ख़ुशी है माँ क्या है? वो पागलपन माँ क्या है? सीतल पलना माँ क्या है? मन की आशा माँ क्या है? मेरी भाषा माँ क्या है? वो सोना है माँ क्या है? हाँ हीरा है माँ क्या है? वो मोती है माँ क्या है? डर की कदगन माँ क्या है? दिल की धड़कन माँ क्या है? मन का भटकन माँ क्या है? दिल का बंधन माँ क्या है? जग का दर्शन तू क्या है? बेटा उस का वो क्या है? जीवन मेरी वो क्या है? जीवन मेरी
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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"यादों के सहारे" वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे चाहे आँसू आँखों के दोनों किनारे काट लेंगे अपनी अपनी बात है होगा कहीं वो भी अकेले याद करता हो कहीं यूँँ ही अकेली रातों में भी पर ये मेरा ही भरम है वो बहुत ख़ुश हो कहीं पे और हो तो बात अच्छी है कि सबकी ज़िंदगी है अपना क्या है यार तन्हाई बहारें काट लेंगे ख़ूब-सूरत होश वाले सब इशारे काट लेंगे होंठों पे मुस्कान ले के सब शरारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे
Raunak Karn
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लाख तकलीफ़ें लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना सर्द रातों में कभी जो ख़्वाब टूटे ज़िंदगी गर जो कभी भी तुम सेे रूठे याद रखना आस का दामन न छूटे तोड़ देना पिंजरा तुम चाहे सपन का हौसला ख़ुद का ही ख़ुद से तुम बढ़ाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना पीठ पीछे कर के देखो तुम न चलना वक़्त के जैसे कभी भी तुम न ढलना कोशिशों के साथ जीना कर न मलना राग गाना तुम ख़ुशी के तब मिलन का बारिशों के बूंदों से ख़ुद को भिगाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना क़ाफ़िला होगा तिरे पीछे चलेंगे वक़्त ले कर के सभी तुझ सेे मिलेंगे दर्द सारे घाव सब के सब भरेंगे साथ ये मत छोड़ना तुम बस जतन का दिल के रिश्ते को ज़रा दिल से निभाना नाम ऊँचा ख़ूब ऊँचा तुम बनाना रूठे लोगों को कभी दिल से मनाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना
Raunak Karn
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"दिखावा अब नहीं करना" किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी पागल नहीं होना कभी दिल भी नहीं देना कभी हँसते ही रहना है कभी मर मर के जीना है कभी इज़हार मत करना कभी तुम साथ मत रहना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है किसी को दिल नहीं देना अकेला अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी जो छोड़ दे कोई बहुत तकलीफ़ होती है उसी की याद में ये आँख सारी रात रोती है ज़रा ख़ुद को निखारो अब बनाओ नाम अब अपना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है सताए तुम को कोई ख़ुद को आधा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना हमारे पास तो घर भी नहीं है यार रहने को कोई पूछे हमारे पास क्या ही होगा कहने को कभी हम रो नहीं सकते कभी कुछ कह नहीं सकते कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है अकेले घुट के मरने का इरादा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना किसी से कोई झूठा सच्चा वा'दा अब नहीं करना किसी को जान या अपना पराया अब नहीं करना किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना
Raunak Karn
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तुम को बताते कि उस पार क्या है निगाहों से होकर कभी दिल में जाते कलेजे पे रख सर सदा सी सुनाते वो ख़्वाबों की लोरी हक़ीक़त बनाते दु'आओं में जैसे कोई बात लाते मुझे अपने दिल की जो बातें बताती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है छुपा के जो रक्खे थे लफ़्ज़ों में जज़्बें किए थे मिरे दिल पे तुम ने ही क़ब्ज़े तेरे नाम वाले सभी ख़त वहीं थे तेरे होंठ पे गीत मेरे भी बसते कभी पास आ कर अगर तुम जो पढ़ते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है वो ख़्वाबों की रातें वो तन्हा सवेरा वो सन्नाटे जिन में था तेरा बसेरा लबों पे दुआ थी तेरे नाम वाली दुआ में थी बस रौशनी काली काली अगर एक पल को भी तुम मिलने आती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है कभी धड़कनों में जो लफ़्ज़ों को पाते कभी साँसों से शे'र मेरे बनाते तेरे होंठ खुल के अगर कुछ भी कहते दिलों में मिरे लफ़्ज़ तेरे ही रहते जो तुम मेरी ख़ामोशियों को समझते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है हरी धार लहरों की चलके जो आती मुहब्बत के मानी तुम्हें तब बताती मेरे दिल में बजते सभी राग गाते ज़रा सा कभी तुम जो वो राग गाती नज़र से नज़र को कभी तुम मिलाती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है मुझे जो बताते अगर सब जताते तो मालूम होता कि उस पार क्या है ज़रा सा बताऊॅं कि उस पार क्या है है उस पार इक बेज़बाॅं सी कहानी जिसे पढ़ के आँखों में आ जाए पानी जिसे मैं ने ख़ुद को सुनाया हमेशा जिसे पढ़ के ख़ुद को है पाया अकेला न जाने वो इक चेहरा दिखने में प्यारा उसी के लिए है मिरे दिल में रिश्ते वही बन गए हैं मिरे दिल के हिस्से वो अश्कों की गर्मी वो नज़रों की छाया जिधर देखा मैं ने उधर उस को पाया वहाँ ख़्वाब बुनते हैं वीराने लम्हें जिसे देख धड़कन रहे सह में सह में वहाँ हर दुआ में तेरा नाम आता वहाँ हर ग़ज़ल में तू हीं मुस्कुराता वहाँ बिन तेरे कुछ भी रौशन नहीं है वहाँ तेरी बातें ही केवल सही हैं मैं हर दर्द को इक सहारा बनाता मैं तकलीफ़ों में तुझ को जीना सिखाता कभी बहते झरने किनारे जो मिलते गले से लगाता निगाहें बिछाता मुहब्बत है हम को ये तुम जान पाती इधर से निखरती उधर से सॅंवरती हँसी ख़ूब करती लगड़ती झगड़ती अगर तू कभी दिल की तह तक उतरती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है तो तुम को बताते कि उस पार क्या है
Raunak Karn
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"ग़म" उसी को याद कर के अब बहलते हो बता भी दो ज़हर तुम क्यूँ निगलते हो हक़ीक़त है उसे तुम जान कहते थे भला तुम जान को अब क्यूँ मसलते हो कहा था दर्द टेलीग्राम को उस ने उड़ा कर के चलो जाओ मेरे दिल से मगर फिर भी उसे तुम याद क्यूँ करते रहे रौनक ग़मों के दौर में चलते रहे रौनक गए वो छोड़ कर मलते रहे रौनक बदलना था बदलते दिल तुम्हीं रौनक उसी के आँख में ढलते रहे रौनक
Raunak Karn
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