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"ग़म" उसी को याद कर के अब बहलते हो बता भी दो ज़हर तुम क्यूँ निगलते हो हक़ीक़त है उसे तुम जान कहते थे भला तुम जान को अब क्यूँ मसलते हो कहा था दर्द टेलीग्राम को उस ने उड़ा कर के चलो जाओ मेरे दिल से मगर फिर भी उसे तुम याद क्यूँ करते रहे रौनक ग़मों के दौर में चलते रहे रौनक गए वो छोड़ कर मलते रहे रौनक बदलना था बदलते दिल तुम्हीं रौनक उसी के आँख में ढलते रहे रौनक

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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"यादों के सहारे" वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे चाहे आँसू आँखों के दोनों किनारे काट लेंगे अपनी अपनी बात है होगा कहीं वो भी अकेले याद करता हो कहीं यूँँ ही अकेली रातों में भी पर ये मेरा ही भरम है वो बहुत ख़ुश हो कहीं पे और हो तो बात अच्छी है कि सबकी ज़िंदगी है अपना क्या है यार तन्हाई बहारें काट लेंगे ख़ूब-सूरत होश वाले सब इशारे काट लेंगे होंठों पे मुस्कान ले के सब शरारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे

Raunak Karn

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लाख तकलीफ़ें लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना सर्द रातों में कभी जो ख़्वाब टूटे ज़िंदगी गर जो कभी भी तुम सेे रूठे याद रखना आस का दामन न छूटे तोड़ देना पिंजरा तुम चाहे सपन का हौसला ख़ुद का ही ख़ुद से तुम बढ़ाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना पीठ पीछे कर के देखो तुम न चलना वक़्त के जैसे कभी भी तुम न ढलना कोशिशों के साथ जीना कर न मलना राग गाना तुम ख़ुशी के तब मिलन का बारिशों के बूंदों से ख़ुद को भिगाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना क़ाफ़िला होगा तिरे पीछे चलेंगे वक़्त ले कर के सभी तुझ सेे मिलेंगे दर्द सारे घाव सब के सब भरेंगे साथ ये मत छोड़ना तुम बस जतन का दिल के रिश्ते को ज़रा दिल से निभाना नाम ऊँचा ख़ूब ऊँचा तुम बनाना रूठे लोगों को कभी दिल से मनाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना

Raunak Karn

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"दिलबर" तुम पास अब आ जाओ, दिल में मिरे आ जाओ छोड़ो न बात ये सब, तुम बस मुझे सताओ कुछ बात मैं बताऊँ, कुछ बात तुम बताओ अब तो कहो न कुछ तुम, यूँँ दूर अब न जाओ आँखों में तुम आ जाओ, साँसों में तुम आ जाओ दिलबर मिरे आ जाओ, दिलबर मिरे आ जाओ

Raunak Karn

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नज़्म- क्या लिखूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को शाम, तुम को रात, तुम को चाँद, तुम को राह, तुम को चाह, तुम को शाह, तुम को बाह, तुम को नाह, बोलो मैं लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें जीवन लिखूँ अपना या फिर लोबान मैं लिख दूँ लिखूँ महफ़िल तुम्हें अपना या फिर सुनसान मैं लिख दूँ लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना या फिर मेहमान मैं लिख दूँ लिखूँ आँसू तुम्हें अपना या फिर मुस्कान मैं लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को तुम्हें नादान, या अंजान या साथी, या लिख दूँ राह का रहबर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को धूप सूरज सा या शामों सा सुकूँ लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मैं अपना दिल मैं अपनी जान या धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को क़लम लिख दूँ किताबें भी लिखूँ तुम को नयन की मैं चमक या फूल की धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को लिखूँ तुम को मैं ठंडी रात का चादर या लिख दूँ नींद का बिस्तर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें झुमका, तुम्हें आँचल, तुम्हें धड़कन तुम्हें चाँदी, तुम्हें सोना, तुम्हें हीरा तुम्हें पायल, तुम्हें कोमल, तुम्हें मूरत तुम्हें पीतल, तुम्हें जल थल, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर

Raunak Karn

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तुम को बताते कि उस पार क्या है निगाहों से होकर कभी दिल में जाते कलेजे पे रख सर सदा सी सुनाते वो ख़्वाबों की लोरी हक़ीक़त बनाते दु'आओं में जैसे कोई बात लाते मुझे अपने दिल की जो बातें बताती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है छुपा के जो रक्खे थे लफ़्ज़ों में जज़्बें किए थे मिरे दिल पे तुम ने ही क़ब्ज़े तेरे नाम वाले सभी ख़त वहीं थे तेरे होंठ पे गीत मेरे भी बसते कभी पास आ कर अगर तुम जो पढ़ते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है वो ख़्वाबों की रातें वो तन्हा सवेरा वो सन्नाटे जिन में था तेरा बसेरा लबों पे दुआ थी तेरे नाम वाली दुआ में थी बस रौशनी काली काली अगर एक पल को भी तुम मिलने आती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है कभी धड़कनों में जो लफ़्ज़ों को पाते कभी साँसों से शे'र मेरे बनाते तेरे होंठ खुल के अगर कुछ भी कहते दिलों में मिरे लफ़्ज़ तेरे ही रहते जो तुम मेरी ख़ामोशियों को समझते तो तुम को बताते कि उस पार क्या है हरी धार लहरों की चलके जो आती मुहब्बत के मानी तुम्हें तब बताती मेरे दिल में बजते सभी राग गाते ज़रा सा कभी तुम जो वो राग गाती नज़र से नज़र को कभी तुम मिलाती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है मुझे जो बताते अगर सब जताते तो मालूम होता कि उस पार क्या है ज़रा सा बताऊॅं कि उस पार क्या है है उस पार इक बेज़बाॅं सी कहानी जिसे पढ़ के आँखों में आ जाए पानी जिसे मैं ने ख़ुद को सुनाया हमेशा जिसे पढ़ के ख़ुद को है पाया अकेला न जाने वो इक चेहरा दिखने में प्यारा उसी के लिए है मिरे दिल में रिश्ते वही बन गए हैं मिरे दिल के हिस्से वो अश्कों की गर्मी वो नज़रों की छाया जिधर देखा मैं ने उधर उस को पाया वहाँ ख़्वाब बुनते हैं वीराने लम्हें जिसे देख धड़कन रहे सह में सह में वहाँ हर दुआ में तेरा नाम आता वहाँ हर ग़ज़ल में तू हीं मुस्कुराता वहाँ बिन तेरे कुछ भी रौशन नहीं है वहाँ तेरी बातें ही केवल सही हैं मैं हर दर्द को इक सहारा बनाता मैं तकलीफ़ों में तुझ को जीना सिखाता कभी बहते झरने किनारे जो मिलते गले से लगाता निगाहें बिछाता मुहब्बत है हम को ये तुम जान पाती इधर से निखरती उधर से सॅंवरती हँसी ख़ूब करती लगड़ती झगड़ती अगर तू कभी दिल की तह तक उतरती तो तुम को बताते कि उस पार क्या है तो तुम को बताते कि उस पार क्या है

Raunak Karn

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