“सिर्फ़ तुम” कभी बारिश की आब में कभी ग़ज़ल की किताब में कभी सुनहरे किसी ख़्वाब में कभी इश्क़ के जवाब में सिर्फ़ तुम नज़र आती हो कभी शीतल किसी रात में कभी पुराने किसी नग़्मात में कभी क़लम से निकले जज़्बात में कभी भेजे तुम्हारे सौग़ात में सिर्फ़ तुम नज़र आती हो कभी नदियों की धार में कभी पंछियों की गुहार में कभी प्यार के ख़ुमार में कभी अश्क के फुहार में सिर्फ़ तुम नज़र आती हो कभी किसी की आवाज़ में कभी किसी के अन्दाज़ में कभी अपने ही अल्फ़ाज़ में कभी गीत में कभी साज़ में सिर्फ़ तुम नज़र आती हो सिर्फ़ तुम नज़र आती हो
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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“आख़िरी सवाल” बीते दिनों को जाने किस तरह से याद कर तो कभी उन को भूल कर बैठी होगी तुम कहीं पे पलकें झुकाये हुए तो कभी उठाए हुए लिपट कर तुम्हारे दामन से देखो पूछता होगा एक उदास दिल कि अब क्या क्या याद करती हो कि अब क्या क्या भुला देती हो
Prakash Pandey
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चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र
Prakash Pandey
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एक सपना एक सपना है मेरा कि कभी ऐसे मिलूँ तुम सेे जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे जब मैं कभी तारों को देखूँ तो कभी तुम्हें कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी तुम्हारी उस काली बिंदी और सफ़ेद झुमके के आगे मुझे फीकी लगने लगे तुम कहो मुझ सेे कि सुनो कोई गीत मुझे सुनाओ ना फिर कर के कोई इशारा तुम मुझे पास अपने बुलाओ ना तब मैं वो गीत सुनाऊँ जो तुम्हें बेहद पसंद है हाँ हाँ वही हमारा गीत गाते-गाते मैं कहूँ तुम सेे कि सुनो साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना देख कर एक ऐसी मुहब्बत बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़ था में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे मुस्कुराके देखती रहो गुनगुनाती रहो और फिर बिन कहे लिपट जाओ तुम मुझ सेे इस क़दर कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके तुम ख़ुद भी नहीं
Prakash Pandey
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“ख़्वाबों के बुलबुले” एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब कोशिश की दिल ने छूने की फूट गया अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए और वो प्यार से देखे उन को फिर गले लगाए पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ सेे दूर कितनी मर्तबा समझाया मैं ने मगर दिल अब भी बे-क़रार है वो आएँगे नहीं शायद फिर भी उन का इंतिज़ार है इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते
Prakash Pandey
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एक आहट तन्हाई को बाहों में लिए सो रहा था मैं किसी ने यादों का दिया जला मुझ को जगा दिया वो तुम ही थीं क्या सोचा कि उस दिए को देख के ही रात गुज़ार लूँ किसी ने चूम कर माथे को फिर से मुझे सुला दिया वो तुम ही थीं क्या सूरज की किरणों को जब तरस न आया मेरी उजड़ी नींदों पे किसी ने अपनी ज़ुल्फ़ों का चादर मुझ पे बिछा दिया वो तुम ही थीं क्या खुली जब आँखें मेरी तलाश थी उन्हें एक चेहरे की किसी ने अपने रुख़ को मुझ सेे दूर कहीं छुपा दिया वो तुम ही थीं क्या ढूँढा तो बहुत मैं ने कोई निशाँ अपने मकान में किसी ने अपने आने के हर निशान को ही मिटा दिया वो तुम ही थीं क्या
Prakash Pandey
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