nazmKuch Alfaaz

"सूखे हुए बेले" तुम ने सूखे हुए बेले भी कभी सूँघे हैं इन को मसला न करो कितनी आज़ुर्दा मगर भीनी महक देते हैं इन को फेंका न करो गर्द-आलूद बुझे चेहरों को समझा भी करो सिर्फ़ देखा न करो हाथ के छालों का गट्ठों का मुदावा भी करो सिर्फ़ छेड़ा न करो तुम ने सूखे हुए बेले भी कभी सूँघे हैं

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"जमालियात" जमालियात का नक़्क़ाद जितना हैराँ है वो बाब-ए-हुस्न में भी उतना ही परेशाँ है जमालियात में क्या है जो ख़ुद नहीं फ़न में जमालियात का महवर नशात-ए-दौराँ है जमालियात को फ़रहंग में करो न तलाश जमालियात में ज़ुल्फ़-ए-सुख़न की अफ़्शाँ है जमालियात को उस्लूब में शुमार करो जमालियात में हर फ़र्द इक दबिस्ताँ है जमालियात तग़य्युर-पज़ीर हिस्सियत जमालियात में सहरा भी इक गुलिस्ताँ है जमालियात सक़ाफ़त का हफ़्त रंग लिबास जो रंग ओ नस्ल की तफ़रीक़ से गुरेज़ाँ है जमालियात बदलते हैं माह-ओ-साल के साथ जमालियात में तारीख़-ए-फ़िक्र-ए-इंसाँ है जमालियात हैं तख़्लीक़ फ़न का सर चश्मा अदीब अदब के लिए ख़ुद जमाल सामाँ है जमालियात में है हुस्न-ए-कार का जादू जमालियात की तस्ख़ीर कार-ए-मर्दां है कोई उसूल नहीं हुस्न के परखने का कहीं ख़िज़ाँ है हसीं और कहीं बहाराँ है जहाँ में जितने हैं फ़नकार उतनी तरह के हुस्न तो क्या बंधे टिके मेयार-ए-नौ का इम्काँ है बदलता रहता है मेयार-ए-हुस्न हुस्न के साथ तो किस लिए कोई नक़्क़ाद-ए-फ़न परेशाँ है

Wamiq Jaunpuri

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"भूका बंगाल" पूरब देस में डुग्गी बाजी फैला सुख का हाल दुख की आगनी कौन बुझाए सूख गए सब ताल जिन हाथों में मोती रो ले आज वही कंगाल आज वही कंगाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल पीठ से अपने पेट लगाए लाखों उल्टे खाट भीक-मँगाई से थक थक कर उतरे मौत के घाट जियन-मरन के डंडे मिलाए बैठे हैं चंडाल रे साथी बैठे हैं चंडाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल नद्दी नाले गली डगर पर लाशों के अम्बार जान की ऐसी महँगी शय का उलट गया व्यापार मुट्ठी भर चावल से बढ़ कर सस्ता है ये माल रे साथी सस्ता है ये माल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल कोठरियों में गाँजे बैठे बनिए सारा अनाज सुंदर-नारी भूक की मारी बेचे घर-घर लाज चौपट-नगरी कौन सँभाले चार तरफ़ भूँचाल चार तरफ़ भूँचाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल पुरखों ने घर बार लुटाया छोड़ के सब का साथ माएँ रोईं बिलक बिलक कर बच्चे भए अनाथ सदा सुहागन बिधवा बाजे खोले सर के बाल रे साथी खोले सर के बाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल अत्ती-पत्ती चबा-चबा कर जूझ रहा है देस मौत ने कितने घूँघट मारे बदले सौ सौ भेस काल बकुट फैलाए रहा है बीमारी का जाल रे साथी बीमारी का जाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल धरती-माता की छाती में चोट लगी है कारी माया-काली के फंदे में वक़्त पड़ा है भारी अब से उठ जा नींद के माते देख तू जग का हाल रे साथी देख तू जग का हाल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल प्यारी-माता चिंता मत कर हम हैं आने वाले कुंदन-रस खेतों में तेरी गोद बसाने वाले ख़ून पसीना हल हंसिया से दूर करेंगे काल रे साथी दूर करेंगे काल भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल

Wamiq Jaunpuri

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"जश्न-ए-नौशीन" घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़ फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़ फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़ है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़ बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़ तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़ घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़ बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़

Wamiq Jaunpuri

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"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को

Wamiq Jaunpuri

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"सफ़र-ए-ना-तमाम" ज़िंदगी कौन सी मंज़िल पे रुकी है आ कर आगे चलती भी नहीं राह बदलती भी नहीं सुस्त-रफ़्तार है ये दौर-ए-उबूरी कितना सख़्त ओ बे-जान है वो पैकर नूरी कितना चाँद इक ख़्वाब जो था शहर-ए-उम्मीद तह-ए-आब जो था हुस्न के माथे का नन्हा टीका पाए आदम के तले आते ही उतरे चेहरे की तरह हो गया कितना फीका हम-जुनूँ केश ओ तरह-दार हमेशा के जो थे भागते-सायों के पीछे दौड़े दाहने बाएँ जो डालीं नज़रें हो के बे-कैफ़ हटा लीं नज़रें मौत अफ़्लास जफ़ा अय्यारी भूत इफ़रीत चुड़ैलें ख़्वारी नाचती गाती थिरकती हँसती क़हक़हे गालियाँ लड़ती डसती हड्डियाँ चूसती यर्क़ान-ज़दा लाशों की पंजों में तार-ए-कफ़न शो'ला दहन बस्ती की बस्तियाँ झुलसाती हुई शहर पहुँचीं तो खुले दर पाए चढ़ गईं सीढ़ियों पर खट खट खट बदन होने लगे पट ले लिया दाँतों में शिरयानों को वेम्पाएर की तरह ज़िंदगी कौन सी मंज़िल पे रुकी है आ कर आगे चलती भी नहीं राह बदलती भी नहीं मसअला ये है कि अब इस में पहल कौन करे आसमाँ दूर ज़मीं चूर कहाँ जाए कोई काश ऐसे में चला आए कोई दिल-ए-आशुफ़्ता को बहलाए कोई बतलाए कोई किस तरह फूटती है ख़ुश्क शजर में कोंपल

Wamiq Jaunpuri

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