सोचता हूँ वक़्त की गर्दन पकड़ कर रेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा कर खींच लूँ और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ ज़मीं से आसमाँ तक सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए सोचता हूँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर और थोड़ी देर बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ खेलने से भी जब अपना दिल न बहले एक पत्थर पर पटख़ कर हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ सोचता हूँ आसमाँ से छीन कर जलते हुए सूरज की थाली एक कश्ती की तरह गहरे समुंदर में चलाऊँ और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर ग़र्क़ कर दूँ सोचता हूँ सोचते ही सोचते मैं ख़ुद ही इक दिन सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
Related Nazm
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
20 likes
"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
236 likes
"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
191 likes
"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
108 likes
More from Kaif Ahmad Siddiqui
वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक फ़र्द के हमदर्द ग़म-गुसार-ए-वतन सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी वो एकता के पुजारी हर एक के भाई वो फ़ख़्र-ए-क़ौम वो इंसानियत के शैदाई ज़मीं पे रह के भी इक आसमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी कली कली को तबस्सुम का एक ढंग दिया हर एक फूल को अपने लहू का रंग दिया बहार-ए-गुलशन-ए-अम्न-ओ-अमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक दिल में जलाया चराग़-ए-आज़ादी है जिन के ख़ून से शादाब बाग़-ए-आज़ादी हमारे मुल्क के वो बाग़बाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी सुनी न बात तशद्दुद भरे उसूलों की महक लुटाई अहिंसा के नर्म फूलों की ख़ुलूस-ओ-इज्ज़ के इक गुलिस्ताँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी
Kaif Ahmad Siddiqui
0 likes
सारी दुनिया में ला-जवाब बनो इंतिख़ाबों का इंतिख़ाब बनो अम्न-ओ-इंसानियत की आब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम हो हिन्दोस्ताँ के मुस्तक़बिल तुम से रौशन हो जादा-ए-मंज़िल आरज़ूओं के माहताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो कामयाबी की शाह-राहों में मादर-ए-हिन्द की निगाहों में जगमगाते हसीन ख़्वाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो दूर दुनिया से तीरगी कर दो सारे आलम में रौशनी कर दो इल्म-ओ-हिकमत के आफ़्ताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम से दुनिया में शांति फैले मुर्दा क़ौमों में ज़िंदगी फैले अपने मक़्सद में कामयाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिंद के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो
Kaif Ahmad Siddiqui
0 likes
अगर तेरे मेदे में है कुछ गिरानी तो लेमू का रस पी ले अदरक का पानी अगर दाँत के दर्द से तू है बेकल तो सरसों का तेल और सेंधा नमक मल थकन से अगर तेरे आ'ज़ा हैं ढीले तो थोड़ा सा तू गुनगुना दूध पी ले गले में ख़राबी है नज़ले के मारे तो नमकीन पानी के कर ले ग़रारे अगर ख़ूँ है कम और बल्ग़म ज़ियादा तो गाजर भी खा और शलजम ज़ियादा जिगर ही के दम से है इंसान जीता जिगर का मरज़ है तो खा ले पपीता अगर ज़ेहन कमज़ोर रहता है अक्सर तो खा शहद के साथ बादाम घिस कर अगर तुझ को एहसास है ज़ोफ़-ए-दिल का तो हर रोज़ ले आँवले का मुरब्बा
Kaif Ahmad Siddiqui
0 likes
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना फिर एक दूसरे को आपस ही में मनाना अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले
Kaif Ahmad Siddiqui
0 likes
आग़ोश-ए-वालिदा में पाला था हम को जिस ने इक पैकर-ए-अदब में ढाला था हम को जिस ने जिस ने है इब्तिदास हर ज़िंदगी सँवारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी बचपन में जिस ने मीठी लोरी सुनाई हम को जिस के तुफ़ैल झूले में नींद आई हम को रस घोलती है जिस की आवाज़ प्यारी प्यारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस की मदद से हम ने अपनी ज़बान खोली जिस में समा गई है सारे जहाँ की बोली जिस की हर इक सिफ़त है सौ ख़ूबियों पे भारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस से मिटा जहालत की रात का अँधेरा हिन्दोस्ताँ में चमका तहज़ीब का सवेरा है जिस की रौशनी का हर घर में फ़ैज़ जारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी वो 'कृष्ण' हों कि 'बेदी' 'चकबस्त' हों कि 'तालिब' 'महरूम' हों कि 'हाली' 'इक़बाल' हों कि 'ग़ालिब' सदियों हर अहल-ए-मज़हब जिस का रहा पुजारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस ने ख़ुलूस-ए-दिल से ऐ 'कैफ़' सब को पाला जिस का हर एक घर में अब भी है बोल-बाला दुश्मन के भी दिलों पर है जिस का ख़ौफ़ तारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी
Kaif Ahmad Siddiqui
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Kaif Ahmad Siddiqui.
Similar Moods
More moods that pair well with Kaif Ahmad Siddiqui's nazm.







