इस शहर में शाम होते ही गलियों के नुक्कड़ पर सड़कों के किनारे ज़िंदा-दिल लोग आँखों के कटोरे लिए खड़े हो जाते हैं और शाख़-ए-गुल की तरह लचकती महकती लड़कियाँ हुस्न की ख़ैरात बाँटती फिरती हैं ख़ूब-सूरत तनौ-मंद बच्चे फूलों की तरह मुस्कुराते एक हाथ में खिलौने एक हाथ में माँ की उँगली पकड़े हँसते-खेलते गुज़रते हैं मय-कदों में रिंद जाम पर जाम लुंढाते हैं घरों में पकने वाले खानों की ख़ुश्बू इश्तिहा को तेज़ करती है कितना ख़ूब-सूरत कितना जान-दार है वो शहर जिसे मेरी बंद आँखों के अलावा किसी और ने नहीं देखा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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वो लम्हा वो पुर-शौक़ ओ पुर-सोज़ लम्हा जो हमराह तेरे गुज़ारा था मैं ने वही ज़िंदगी था और अब ये जो मुद्दत से है आमद-ओ-शुद नफ़स की उसी एक लम्हा की क़ीमत है शायद
Iftikhar Aazmi
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दश्त-ए-गर्म-ओ-सर्द में ये बे-दयारों का हुजूम बे-ख़बर माहौल से चुप-चाप ख़ुद से हम-कलाम चल रहा है सर झुकाए इस तरह जिस तरह मरघट पे रूहों का ख़िराम ज़र्द चेहरों पर है सदियों की थकन साँस लेते हैं कुछ ऐसे जैसे होती हो चुभन होंट पर ग़मगीं तबस्सुम और सीने में बुका हर क़दम पर हड्डियों के कड़कड़ाने की सदा उन की आँखें जिन पे हुक्म-ए-दीदा-ए-बीना लगाते हैं देवताओं की बसीरत काँप जाए ज़ेहन ओ दिल का फ़ासला तय करते करते हाँप जाए वुसअत-ए-अर्ज़-ओ-समा इक दीदा-ए-हैरान है उफ़! ये मेला किस क़दर वीरान है!!
Iftikhar Aazmi
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शाम जब ढलती है मैं अपने ख़राबे की तरफ़ लोटता हूँ सर-निगूँ, बोझल क़दम बारा घंटों की मशक़्क़त और थकन बढ़ के ले लेती है मुझ को गोद में और सैल-ए-तीरगी में डूब जाती है उम्मीद ओ शौक़ की इक इक किरन रहगुज़ार-ए-आरज़ू पर चार-सू उड़ती है धूल और इक आवाज़ आती है कहीं से जो कि अन-जानी भी पहचानी भी है ज़िंदगी कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं इक मुसलसल मर्ग, इक सैल-ए-बला, नेज़ों के बन आहों, कराहों के सिवा फिर इसी तारीक लम्हे, फिर इसी नाज़ुक घड़ी आरज़ू की रहगुज़र पर चंद नक़्श-ए-पा उभरते हैं सितारों की तरह लहलहाता है कोई आँचल बहारों की तरह फैल जाती है किसी गेसू की निकहत चार-सू एक फ़िरदौसी तबस्सुम की सुनहरी चाँदनी धी में धी में, ज़ीना ज़ीना गुनगुनाती, रक़्स फ़रमाती हुई बाम-ए-ग़म से ख़ाना-ए-दिल में उतर कर थपथपाती है मुझे गीत गाती है, कभी लोरी सुनाती है मुझे और फिर जब सुब्ह को ख़ुर्शीद-ए-आलम-ताब की पहली किरन गुदगुदाती है मुझे कार-गाह-ए-दहर में वापस बुलाती है मुझे आरज़ू ओ जुस्तुजू दिल में जवाँ पाता हूँ मैं शौक़ की मय के नशे में चूर हो जाता हूँ मैं!!
Iftikhar Aazmi
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ज़माने के सहरा में ग़ल्ले से बिछड़ी हुई भेड़ तन्हा पशेमाँ हिरासाँ हिरासाँ उम्मीद ओ मोहब्बत की इक जोत आँखों में अपनी जगाए हर इक राह-रौ की तरफ़ देखती है कि इन में ही शायद कोई मेरे ग़ल्ले का भी पासबाँ हो मगर इस बयाबाँ में शायद सराब और परछाइयों के सिवा कुछ नहीं है मुझे कौन सीने से अपने लगाए कि ईसा तो मुद्दत हुई आसमानों में गुम हो चुके हैं!
Iftikhar Aazmi
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दुनिया एक कुँवारी माँ है हम सब हैं ना-जाएज़ बच्चे जो अपने नादीदा पिदर की हिर्स ओ गुनह के पछतावे को अपने अपने कंधे पर लादे फिरते हैं मरने की धुन में जीते हैं
Iftikhar Aazmi
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