ज़माने के सहरा में ग़ल्ले से बिछड़ी हुई भेड़ तन्हा पशेमाँ हिरासाँ हिरासाँ उम्मीद ओ मोहब्बत की इक जोत आँखों में अपनी जगाए हर इक राह-रौ की तरफ़ देखती है कि इन में ही शायद कोई मेरे ग़ल्ले का भी पासबाँ हो मगर इस बयाबाँ में शायद सराब और परछाइयों के सिवा कुछ नहीं है मुझे कौन सीने से अपने लगाए कि ईसा तो मुद्दत हुई आसमानों में गुम हो चुके हैं!
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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वो लम्हा वो पुर-शौक़ ओ पुर-सोज़ लम्हा जो हमराह तेरे गुज़ारा था मैं ने वही ज़िंदगी था और अब ये जो मुद्दत से है आमद-ओ-शुद नफ़स की उसी एक लम्हा की क़ीमत है शायद
Iftikhar Aazmi
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दश्त-ए-गर्म-ओ-सर्द में ये बे-दयारों का हुजूम बे-ख़बर माहौल से चुप-चाप ख़ुद से हम-कलाम चल रहा है सर झुकाए इस तरह जिस तरह मरघट पे रूहों का ख़िराम ज़र्द चेहरों पर है सदियों की थकन साँस लेते हैं कुछ ऐसे जैसे होती हो चुभन होंट पर ग़मगीं तबस्सुम और सीने में बुका हर क़दम पर हड्डियों के कड़कड़ाने की सदा उन की आँखें जिन पे हुक्म-ए-दीदा-ए-बीना लगाते हैं देवताओं की बसीरत काँप जाए ज़ेहन ओ दिल का फ़ासला तय करते करते हाँप जाए वुसअत-ए-अर्ज़-ओ-समा इक दीदा-ए-हैरान है उफ़! ये मेला किस क़दर वीरान है!!
Iftikhar Aazmi
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शाम जब ढलती है मैं अपने ख़राबे की तरफ़ लोटता हूँ सर-निगूँ, बोझल क़दम बारा घंटों की मशक़्क़त और थकन बढ़ के ले लेती है मुझ को गोद में और सैल-ए-तीरगी में डूब जाती है उम्मीद ओ शौक़ की इक इक किरन रहगुज़ार-ए-आरज़ू पर चार-सू उड़ती है धूल और इक आवाज़ आती है कहीं से जो कि अन-जानी भी पहचानी भी है ज़िंदगी कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं इक मुसलसल मर्ग, इक सैल-ए-बला, नेज़ों के बन आहों, कराहों के सिवा फिर इसी तारीक लम्हे, फिर इसी नाज़ुक घड़ी आरज़ू की रहगुज़र पर चंद नक़्श-ए-पा उभरते हैं सितारों की तरह लहलहाता है कोई आँचल बहारों की तरह फैल जाती है किसी गेसू की निकहत चार-सू एक फ़िरदौसी तबस्सुम की सुनहरी चाँदनी धी में धी में, ज़ीना ज़ीना गुनगुनाती, रक़्स फ़रमाती हुई बाम-ए-ग़म से ख़ाना-ए-दिल में उतर कर थपथपाती है मुझे गीत गाती है, कभी लोरी सुनाती है मुझे और फिर जब सुब्ह को ख़ुर्शीद-ए-आलम-ताब की पहली किरन गुदगुदाती है मुझे कार-गाह-ए-दहर में वापस बुलाती है मुझे आरज़ू ओ जुस्तुजू दिल में जवाँ पाता हूँ मैं शौक़ की मय के नशे में चूर हो जाता हूँ मैं!!
Iftikhar Aazmi
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इस शहर में शाम होते ही गलियों के नुक्कड़ पर सड़कों के किनारे ज़िंदा-दिल लोग आँखों के कटोरे लिए खड़े हो जाते हैं और शाख़-ए-गुल की तरह लचकती महकती लड़कियाँ हुस्न की ख़ैरात बाँटती फिरती हैं ख़ूब-सूरत तनौ-मंद बच्चे फूलों की तरह मुस्कुराते एक हाथ में खिलौने एक हाथ में माँ की उँगली पकड़े हँसते-खेलते गुज़रते हैं मय-कदों में रिंद जाम पर जाम लुंढाते हैं घरों में पकने वाले खानों की ख़ुश्बू इश्तिहा को तेज़ करती है कितना ख़ूब-सूरत कितना जान-दार है वो शहर जिसे मेरी बंद आँखों के अलावा किसी और ने नहीं देखा
Iftikhar Aazmi
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दुनिया एक कुँवारी माँ है हम सब हैं ना-जाएज़ बच्चे जो अपने नादीदा पिदर की हिर्स ओ गुनह के पछतावे को अपने अपने कंधे पर लादे फिरते हैं मरने की धुन में जीते हैं
Iftikhar Aazmi
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