nazmKuch Alfaaz

दुनिया एक कुँवारी माँ है हम सब हैं ना-जाएज़ बच्चे जो अपने नादीदा पिदर की हिर्स ओ गुनह के पछतावे को अपने अपने कंधे पर लादे फिरते हैं मरने की धुन में जीते हैं

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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वो लम्हा वो पुर-शौक़ ओ पुर-सोज़ लम्हा जो हमराह तेरे गुज़ारा था मैं ने वही ज़िंदगी था और अब ये जो मुद्दत से है आमद-ओ-शुद नफ़स की उसी एक लम्हा की क़ीमत है शायद

Iftikhar Aazmi

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शाम जब ढलती है मैं अपने ख़राबे की तरफ़ लोटता हूँ सर-निगूँ, बोझल क़दम बारा घंटों की मशक़्क़त और थकन बढ़ के ले लेती है मुझ को गोद में और सैल-ए-तीरगी में डूब जाती है उम्मीद ओ शौक़ की इक इक किरन रहगुज़ार-ए-आरज़ू पर चार-सू उड़ती है धूल और इक आवाज़ आती है कहीं से जो कि अन-जानी भी पहचानी भी है ज़िंदगी कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं इक मुसलसल मर्ग, इक सैल-ए-बला, नेज़ों के बन आहों, कराहों के सिवा फिर इसी तारीक लम्हे, फिर इसी नाज़ुक घड़ी आरज़ू की रहगुज़र पर चंद नक़्श-ए-पा उभरते हैं सितारों की तरह लहलहाता है कोई आँचल बहारों की तरह फैल जाती है किसी गेसू की निकहत चार-सू एक फ़िरदौसी तबस्सुम की सुनहरी चाँदनी धी में धी में, ज़ीना ज़ीना गुनगुनाती, रक़्स फ़रमाती हुई बाम-ए-ग़म से ख़ाना-ए-दिल में उतर कर थपथपाती है मुझे गीत गाती है, कभी लोरी सुनाती है मुझे और फिर जब सुब्ह को ख़ुर्शीद-ए-आलम-ताब की पहली किरन गुदगुदाती है मुझे कार-गाह-ए-दहर में वापस बुलाती है मुझे आरज़ू ओ जुस्तुजू दिल में जवाँ पाता हूँ मैं शौक़ की मय के नशे में चूर हो जाता हूँ मैं!!

Iftikhar Aazmi

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दश्त-ए-गर्म-ओ-सर्द में ये बे-दयारों का हुजूम बे-ख़बर माहौल से चुप-चाप ख़ुद से हम-कलाम चल रहा है सर झुकाए इस तरह जिस तरह मरघट पे रूहों का ख़िराम ज़र्द चेहरों पर है सदियों की थकन साँस लेते हैं कुछ ऐसे जैसे होती हो चुभन होंट पर ग़मगीं तबस्सुम और सीने में बुका हर क़दम पर हड्डियों के कड़कड़ाने की सदा उन की आँखें जिन पे हुक्म-ए-दीदा-ए-बीना लगाते हैं देवताओं की बसीरत काँप जाए ज़ेहन ओ दिल का फ़ासला तय करते करते हाँप जाए वुसअत-ए-अर्ज़-ओ-समा इक दीदा-ए-हैरान है उफ़! ये मेला किस क़दर वीरान है!!

Iftikhar Aazmi

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इस शहर में शाम होते ही गलियों के नुक्कड़ पर सड़कों के किनारे ज़िंदा-दिल लोग आँखों के कटोरे लिए खड़े हो जाते हैं और शाख़-ए-गुल की तरह लचकती महकती लड़कियाँ हुस्न की ख़ैरात बाँटती फिरती हैं ख़ूब-सूरत तनौ-मंद बच्चे फूलों की तरह मुस्कुराते एक हाथ में खिलौने एक हाथ में माँ की उँगली पकड़े हँसते-खेलते गुज़रते हैं मय-कदों में रिंद जाम पर जाम लुंढाते हैं घरों में पकने वाले खानों की ख़ुश्बू इश्तिहा को तेज़ करती है कितना ख़ूब-सूरत कितना जान-दार है वो शहर जिसे मेरी बंद आँखों के अलावा किसी और ने नहीं देखा

Iftikhar Aazmi

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ज़माने के सहरा में ग़ल्ले से बिछड़ी हुई भेड़ तन्हा पशेमाँ हिरासाँ हिरासाँ उम्मीद ओ मोहब्बत की इक जोत आँखों में अपनी जगाए हर इक राह-रौ की तरफ़ देखती है कि इन में ही शायद कोई मेरे ग़ल्ले का भी पासबाँ हो मगर इस बयाबाँ में शायद सराब और परछाइयों के सिवा कुछ नहीं है मुझे कौन सीने से अपने लगाए कि ईसा तो मुद्दत हुई आसमानों में गुम हो चुके हैं!

Iftikhar Aazmi

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