ज़मीन गूँगी हो रही है परिंदे चुप साधे उजड़ी शाख़ों पे बैठे नौहा-कुनाँ हैं रात के बदन पे नींद के प्याले औंधे पड़े बिलक रहे हैं औरतों के रहम में ज़िंदा लाशों के गलने-सड़ने से तअ'फ़्फ़ुन फैल रहा है ख़्वाब बस्तियाँ उजड़ रही हैं समुंदरों ने देखा मौत दाँत निकोसती दनदनाती फिरती है बुढ़िया खिड़की से झाँकते चीख़ी कोई मज़हब उसे लगाम क्यूँ नहीं डालता कैसी शुत्र-ए-बे-महार हुई फिरती है कोई दुआ उस का गला क्यूँ नहीं घोंटती इस मनहूस को तावीज़ घोल कर पिलाओ दरबारों में झाड़ू देती बेवक़ूफ़ बुढ़िया फ़िल्म का वही किरदार हिट होता है जिस ने रीहरसल की हो खिड़की में सन्नाटा फैल गया मौत ने अपना गीत जारी रखा
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था भरा हुआ था समुंदर इन्हीं ख़जानों से निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से हमें ख़याल का जंगल भी साथ पड़ता था वो सारे दिन का थका ख़्वाब-गाह में आता थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते नसीम-ए-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़ वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं वो मेरे दिल पर सदा जिस के हाथ रहते थे वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी वहाँ भी जा के उस का निशान देख लिया ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया वो अब्र जिस की तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा बदन की बर्फ़ पिघलने के बा'द पूछेंगे बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर किसी से पहले मिटी है जो मुझ सेे कहते हो
Tehzeeb Hafi
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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सुनो सहेली कहूँ पहेली है जो कोई बूझे सोचो समझो और फिर पूछो अगर तुम्हें ना सूझे सोच समझ कर कहना सुनना अपना एक उसूल फूलों में है सब से प्यारा भला कौन सा फूल सोसन टेसू कमल मोतिया रात की रानी चम्पा न न सूरज-मुखी चमेली दिन का राजा गेंदा इन का क्या है मुरझाएँ तो ख़ाक बनें या धूल कपड़ा बन कर जो तन ढाँके वो कपास का फूल देख भाल कर जाँच परख कर कहना सच्ची बात धातों में है बड़े काम की भला कौन सी धात जिस से बनती थाल कटोरी गागर पीतल ताँबा झानजर झूमर झुमका बन के झुमके चाँदी सोना इंजन मोटर और मशीनें जिस ने कीं ईजाद धातों में है सब से आ'ला लोहा और फ़ौलाद अंदर बाहर एक रहे जो कभी न बदले भेस दुनिया भर में सब से प्यारा भला कौन सा देस प्यार मोहब्बत अमन शांति जिस धरती की शान सब से प्यारा सब से न्यारा अपना हिन्दोस्तान
Unknown
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वफ़ा के पैमान सब भुला कर जफ़ाएँ करते वफ़ा के क़ातिल रसूल-ए-हक़ के जो उम्मती हैं वही हैं आल-ए-एबा के क़ातिल ये उस की अपनी ही मस्लहत है वो जिस्म रखता नहीं है वर्ना ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल न ही अमानत न ही दियानत न ही सदाक़त न ही शराफ़त नबी के मिम्बर पर आ गए हैं नबी की हर इक अदा के क़ातिल इमाम जिन का यज़ीद होगा वो कैसे जानें हुसैन क्या है बने भी हैं क़ारी ला-इलाह के ये ला-इलाह की बक़ा के क़ातिल ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल
Unknown
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अलीगढ़ है यहाँ ऐ दोस्त क्या पाया नहीं जाता यहाँ वो कौन सा शो है जो दिखलाया नहीं जाता ये इल्म-ओ-फ़न का गहवारा है तहज़ीबी इदारा है नज़र में ये हमारी तो सियासत का अखाड़ा है हर इक शो'बे में पाओगे यहाँ तुम पार्टी-बाज़ी यहाँ रहती है आपस में हमेशा तुर्की-ओ-ताज़ी ख़ुदा के फ़ज़्ल से अहल-ए-हुनर हैं अहल-ए-फ़न सब हैं मगर डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने में मगन सब हैं यहाँ आसार बाक़ी हैं अभी जागीर-दारी के मुहाफ़िज़ पाए जाते हैं अभी सरमाया-दारी के ग़ज़ब के हैं जो यहाँ के इंक़िलाबी हैं यहाँ जो इश्तिराकी हैं समझ लो बस किताबी हैं यहाँ मज़हब के ठेकेदार भी मिलते हैं बहतेरे यहाँ लठ-बाज़-ओ-चाक़ू-मार भी मिलते हैं बहतेरे अलीगढ़ के किसी फ़ंक्शन में गर तशरीफ़ ले जाएँ जो फ़िक़्रे-ए-बाज़ियाँ होंगी न उन से आप घबराएँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता गंडे लफ़ंगे और न लच्चे हैं ये तालिब-इल्म कॉलेज के शरीफ़ों के ये बच्चे हैं फ़क़त क़ौमी रिवायत का ये अपनी पास रखते हैं कोई परवा न कीजे ये फ़क़त बकवास रखते हैं हर इक महफ़िल में होती है यहाँ हंगामा-आराई कि अच्छे अच्छे इल्म-ओ-फ़न बनते हैं सौदाई यहाँ अहल-ए-अलीगढ़ जो भी सुब्ह-ओ-शाम करते हैं बड़े लाएक़ हैं सर-सय्यद का ऊँचा नाम करते हैं यहाँ कि बेग में भी इक निराली शान रखती हैं नुमूद-ए-ज़ाहिरी का हर क़दम पर ध्यान रखती हैं पढ़ी-लिक्खी हों या अन-पढ़ यहाँ दोनों बराबर हैं जो मौज़ू-ए-सुख़न सुनिए तो कपड़े और ज़ेवर हैं अलावा इस के या तो नौकरों पर नौहा-ख़्वानी है नहीं तो ग़ीबतें हैं शैख़ियाँ हैं लन-तरानी है समाजी मशग़लों में या तो हैं शादी की तक़रीबें नहीं तो महफ़िल-ए-मीलाद वो मज्लिस नियाज़ और नज़रें कहीं है इज्तिमा तब्लीग़ियों का एक कोठी में तो है शीओं की मज्लिस और रक़ाइम दूसरे घर में ज़रा जो मॉडर्न ठहरीं वो हैं फ़िल्मों की शैदाई नई तस्वीर जो आए तो गोया इन की बन आए
Unknown
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बुलबुल का बच्चा खाता था खिचड़ी पीता था पानी बुलबुल का बच्चा गाता था गाने मेरे सिरहाने बुलबुल का बच्चा एक दिन अकेला बैठा हुआ था बुलबुल का बच्चा मैं ने उड़ाया वापस न आया बुलबुल का बच्चा
Unknown
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बनाया है हम ने ये लकड़ी का घोड़ा सड़ा-सड़ सड़ा-सड़ लगाते हैं कोड़ा ये करता नहीं भूल कर भी कभी हट जिधर चाहा फेरा जिधर चाहा मोड़ा ये खाता नहीं ठोकरें रास्ते में बला से अगर हो कोई ईंट रोड़ा न ये मारता है दोलत्ती किसी के किसी का नहीं इस ने मुँह हाथ तोड़ा न इस ने कभी मुझ को अब तक गिराया न भागा न हरगिज़ मिरा साथ छोड़ा नहीं घास दाने की भी इस को हाजत हवा खा के जीता है मेरा ये घोड़ा कमर इस की लगती नहीं बैठने से निकलता नहीं है कोई फुंसी फोड़ा मैं चढ़ता हूँ रोज़ इस पे कपड़े बदल कर नया मेरा घोड़ा नया मेरा जोड़ा चला-चल मिरे घोड़े सीधा चला चल बहुत चल चुका अब तो रस्ता है थोड़ा
Unknown
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