nazmKuch Alfaaz

बनाया है हम ने ये लकड़ी का घोड़ा सड़ा-सड़ सड़ा-सड़ लगाते हैं कोड़ा ये करता नहीं भूल कर भी कभी हट जिधर चाहा फेरा जिधर चाहा मोड़ा ये खाता नहीं ठोकरें रास्ते में बला से अगर हो कोई ईंट रोड़ा न ये मारता है दोलत्ती किसी के किसी का नहीं इस ने मुँह हाथ तोड़ा न इस ने कभी मुझ को अब तक गिराया न भागा न हरगिज़ मिरा साथ छोड़ा नहीं घास दाने की भी इस को हाजत हवा खा के जीता है मेरा ये घोड़ा कमर इस की लगती नहीं बैठने से निकलता नहीं है कोई फुंसी फोड़ा मैं चढ़ता हूँ रोज़ इस पे कपड़े बदल कर नया मेरा घोड़ा नया मेरा जोड़ा चला-चल मिरे घोड़े सीधा चला चल बहुत चल चुका अब तो रस्ता है थोड़ा

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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अलीगढ़ है यहाँ ऐ दोस्त क्या पाया नहीं जाता यहाँ वो कौन सा शो है जो दिखलाया नहीं जाता ये इल्म-ओ-फ़न का गहवारा है तहज़ीबी इदारा है नज़र में ये हमारी तो सियासत का अखाड़ा है हर इक शो'बे में पाओगे यहाँ तुम पार्टी-बाज़ी यहाँ रहती है आपस में हमेशा तुर्की-ओ-ताज़ी ख़ुदा के फ़ज़्ल से अहल-ए-हुनर हैं अहल-ए-फ़न सब हैं मगर डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने में मगन सब हैं यहाँ आसार बाक़ी हैं अभी जागीर-दारी के मुहाफ़िज़ पाए जाते हैं अभी सरमाया-दारी के ग़ज़ब के हैं जो यहाँ के इंक़िलाबी हैं यहाँ जो इश्तिराकी हैं समझ लो बस किताबी हैं यहाँ मज़हब के ठेकेदार भी मिलते हैं बहतेरे यहाँ लठ-बाज़-ओ-चाक़ू-मार भी मिलते हैं बहतेरे अलीगढ़ के किसी फ़ंक्शन में गर तशरीफ़ ले जाएँ जो फ़िक़्रे-ए-बाज़ियाँ होंगी न उन से आप घबराएँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता गंडे लफ़ंगे और न लच्चे हैं ये तालिब-इल्म कॉलेज के शरीफ़ों के ये बच्चे हैं फ़क़त क़ौमी रिवायत का ये अपनी पास रखते हैं कोई परवा न कीजे ये फ़क़त बकवास रखते हैं हर इक महफ़िल में होती है यहाँ हंगामा-आराई कि अच्छे अच्छे इल्म-ओ-फ़न बनते हैं सौदाई यहाँ अहल-ए-अलीगढ़ जो भी सुब्ह-ओ-शाम करते हैं बड़े लाएक़ हैं सर-सय्यद का ऊँचा नाम करते हैं यहाँ कि बेग में भी इक निराली शान रखती हैं नुमूद-ए-ज़ाहिरी का हर क़दम पर ध्यान रखती हैं पढ़ी-लिक्खी हों या अन-पढ़ यहाँ दोनों बराबर हैं जो मौज़ू-ए-सुख़न सुनिए तो कपड़े और ज़ेवर हैं अलावा इस के या तो नौकरों पर नौहा-ख़्वानी है नहीं तो ग़ीबतें हैं शैख़ियाँ हैं लन-तरानी है समाजी मशग़लों में या तो हैं शादी की तक़रीबें नहीं तो महफ़िल-ए-मीलाद वो मज्लिस नियाज़ और नज़रें कहीं है इज्तिमा तब्लीग़ियों का एक कोठी में तो है शीओं की मज्लिस और रक़ाइम दूसरे घर में ज़रा जो मॉडर्न ठहरीं वो हैं फ़िल्मों की शैदाई नई तस्वीर जो आए तो गोया इन की बन आए

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वफ़ा के पैमान सब भुला कर जफ़ाएँ करते वफ़ा के क़ातिल रसूल-ए-हक़ के जो उम्मती हैं वही हैं आल-ए-एबा के क़ातिल ये उस की अपनी ही मस्लहत है वो जिस्म रखता नहीं है वर्ना ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल न ही अमानत न ही दियानत न ही सदाक़त न ही शराफ़त नबी के मिम्बर पर आ गए हैं नबी की हर इक अदा के क़ातिल इमाम जिन का यज़ीद होगा वो कैसे जानें हुसैन क्या है बने भी हैं क़ारी ला-इलाह के ये ला-इलाह की बक़ा के क़ातिल ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल

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बुलबुल का बच्चा खाता था खिचड़ी पीता था पानी बुलबुल का बच्चा गाता था गाने मेरे सिरहाने बुलबुल का बच्चा एक दिन अकेला बैठा हुआ था बुलबुल का बच्चा मैं ने उड़ाया वापस न आया बुलबुल का बच्चा

Unknown

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सुनो सहेली कहूँ पहेली है जो कोई बूझे सोचो समझो और फिर पूछो अगर तुम्हें ना सूझे सोच समझ कर कहना सुनना अपना एक उसूल फूलों में है सब से प्यारा भला कौन सा फूल सोसन टेसू कमल मोतिया रात की रानी चम्पा न न सूरज-मुखी चमेली दिन का राजा गेंदा इन का क्या है मुरझाएँ तो ख़ाक बनें या धूल कपड़ा बन कर जो तन ढाँके वो कपास का फूल देख भाल कर जाँच परख कर कहना सच्ची बात धातों में है बड़े काम की भला कौन सी धात जिस से बनती थाल कटोरी गागर पीतल ताँबा झानजर झूमर झुमका बन के झुमके चाँदी सोना इंजन मोटर और मशीनें जिस ने कीं ईजाद धातों में है सब से आ'ला लोहा और फ़ौलाद अंदर बाहर एक रहे जो कभी न बदले भेस दुनिया भर में सब से प्यारा भला कौन सा देस प्यार मोहब्बत अमन शांति जिस धरती की शान सब से प्यारा सब से न्यारा अपना हिन्दोस्तान

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ज़मीन गूँगी हो रही है परिंदे चुप साधे उजड़ी शाख़ों पे बैठे नौहा-कुनाँ हैं रात के बदन पे नींद के प्याले औंधे पड़े बिलक रहे हैं औरतों के रहम में ज़िंदा लाशों के गलने-सड़ने से तअ'फ़्फ़ुन फैल रहा है ख़्वाब बस्तियाँ उजड़ रही हैं समुंदरों ने देखा मौत दाँत निकोसती दनदनाती फिरती है बुढ़िया खिड़की से झाँकते चीख़ी कोई मज़हब उसे लगाम क्यूँ नहीं डालता कैसी शुत्र-ए-बे-महार हुई फिरती है कोई दुआ उस का गला क्यूँ नहीं घोंटती इस मनहूस को तावीज़ घोल कर पिलाओ दरबारों में झाड़ू देती बेवक़ूफ़ बुढ़िया फ़िल्म का वही किरदार हिट होता है जिस ने रीहरसल की हो खिड़की में सन्नाटा फैल गया मौत ने अपना गीत जारी रखा

Unknown

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