nazmKuch Alfaaz

वफ़ा के पैमान सब भुला कर जफ़ाएँ करते वफ़ा के क़ातिल रसूल-ए-हक़ के जो उम्मती हैं वही हैं आल-ए-एबा के क़ातिल ये उस की अपनी ही मस्लहत है वो जिस्म रखता नहीं है वर्ना ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल न ही अमानत न ही दियानत न ही सदाक़त न ही शराफ़त नबी के मिम्बर पर आ गए हैं नबी की हर इक अदा के क़ातिल इमाम जिन का यज़ीद होगा वो कैसे जानें हुसैन क्या है बने भी हैं क़ारी ला-इलाह के ये ला-इलाह की बक़ा के क़ातिल ये मंसबों के ग़सब के आदी ज़रूर होते ख़ुदा के क़ातिल

Unknown0 Likes

Related Nazm

वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

160 likes

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

54 likes

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

52 likes

"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

More from Unknown

अलीगढ़ है यहाँ ऐ दोस्त क्या पाया नहीं जाता यहाँ वो कौन सा शो है जो दिखलाया नहीं जाता ये इल्म-ओ-फ़न का गहवारा है तहज़ीबी इदारा है नज़र में ये हमारी तो सियासत का अखाड़ा है हर इक शो'बे में पाओगे यहाँ तुम पार्टी-बाज़ी यहाँ रहती है आपस में हमेशा तुर्की-ओ-ताज़ी ख़ुदा के फ़ज़्ल से अहल-ए-हुनर हैं अहल-ए-फ़न सब हैं मगर डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने में मगन सब हैं यहाँ आसार बाक़ी हैं अभी जागीर-दारी के मुहाफ़िज़ पाए जाते हैं अभी सरमाया-दारी के ग़ज़ब के हैं जो यहाँ के इंक़िलाबी हैं यहाँ जो इश्तिराकी हैं समझ लो बस किताबी हैं यहाँ मज़हब के ठेकेदार भी मिलते हैं बहतेरे यहाँ लठ-बाज़-ओ-चाक़ू-मार भी मिलते हैं बहतेरे अलीगढ़ के किसी फ़ंक्शन में गर तशरीफ़ ले जाएँ जो फ़िक़्रे-ए-बाज़ियाँ होंगी न उन से आप घबराएँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता गंडे लफ़ंगे और न लच्चे हैं ये तालिब-इल्म कॉलेज के शरीफ़ों के ये बच्चे हैं फ़क़त क़ौमी रिवायत का ये अपनी पास रखते हैं कोई परवा न कीजे ये फ़क़त बकवास रखते हैं हर इक महफ़िल में होती है यहाँ हंगामा-आराई कि अच्छे अच्छे इल्म-ओ-फ़न बनते हैं सौदाई यहाँ अहल-ए-अलीगढ़ जो भी सुब्ह-ओ-शाम करते हैं बड़े लाएक़ हैं सर-सय्यद का ऊँचा नाम करते हैं यहाँ कि बेग में भी इक निराली शान रखती हैं नुमूद-ए-ज़ाहिरी का हर क़दम पर ध्यान रखती हैं पढ़ी-लिक्खी हों या अन-पढ़ यहाँ दोनों बराबर हैं जो मौज़ू-ए-सुख़न सुनिए तो कपड़े और ज़ेवर हैं अलावा इस के या तो नौकरों पर नौहा-ख़्वानी है नहीं तो ग़ीबतें हैं शैख़ियाँ हैं लन-तरानी है समाजी मशग़लों में या तो हैं शादी की तक़रीबें नहीं तो महफ़िल-ए-मीलाद वो मज्लिस नियाज़ और नज़रें कहीं है इज्तिमा तब्लीग़ियों का एक कोठी में तो है शीओं की मज्लिस और रक़ाइम दूसरे घर में ज़रा जो मॉडर्न ठहरीं वो हैं फ़िल्मों की शैदाई नई तस्वीर जो आए तो गोया इन की बन आए

Unknown

1 likes

सुनो सहेली कहूँ पहेली है जो कोई बूझे सोचो समझो और फिर पूछो अगर तुम्हें ना सूझे सोच समझ कर कहना सुनना अपना एक उसूल फूलों में है सब से प्यारा भला कौन सा फूल सोसन टेसू कमल मोतिया रात की रानी चम्पा न न सूरज-मुखी चमेली दिन का राजा गेंदा इन का क्या है मुरझाएँ तो ख़ाक बनें या धूल कपड़ा बन कर जो तन ढाँके वो कपास का फूल देख भाल कर जाँच परख कर कहना सच्ची बात धातों में है बड़े काम की भला कौन सी धात जिस से बनती थाल कटोरी गागर पीतल ताँबा झानजर झूमर झुमका बन के झुमके चाँदी सोना इंजन मोटर और मशीनें जिस ने कीं ईजाद धातों में है सब से आ'ला लोहा और फ़ौलाद अंदर बाहर एक रहे जो कभी न बदले भेस दुनिया भर में सब से प्यारा भला कौन सा देस प्यार मोहब्बत अमन शांति जिस धरती की शान सब से प्यारा सब से न्यारा अपना हिन्दोस्तान

Unknown

3 likes

बनाया है हम ने ये लकड़ी का घोड़ा सड़ा-सड़ सड़ा-सड़ लगाते हैं कोड़ा ये करता नहीं भूल कर भी कभी हट जिधर चाहा फेरा जिधर चाहा मोड़ा ये खाता नहीं ठोकरें रास्ते में बला से अगर हो कोई ईंट रोड़ा न ये मारता है दोलत्ती किसी के किसी का नहीं इस ने मुँह हाथ तोड़ा न इस ने कभी मुझ को अब तक गिराया न भागा न हरगिज़ मिरा साथ छोड़ा नहीं घास दाने की भी इस को हाजत हवा खा के जीता है मेरा ये घोड़ा कमर इस की लगती नहीं बैठने से निकलता नहीं है कोई फुंसी फोड़ा मैं चढ़ता हूँ रोज़ इस पे कपड़े बदल कर नया मेरा घोड़ा नया मेरा जोड़ा चला-चल मिरे घोड़े सीधा चला चल बहुत चल चुका अब तो रस्ता है थोड़ा

Unknown

2 likes

बुलबुल का बच्चा खाता था खिचड़ी पीता था पानी बुलबुल का बच्चा गाता था गाने मेरे सिरहाने बुलबुल का बच्चा एक दिन अकेला बैठा हुआ था बुलबुल का बच्चा मैं ने उड़ाया वापस न आया बुलबुल का बच्चा

Unknown

2 likes

ज़मीन गूँगी हो रही है परिंदे चुप साधे उजड़ी शाख़ों पे बैठे नौहा-कुनाँ हैं रात के बदन पे नींद के प्याले औंधे पड़े बिलक रहे हैं औरतों के रहम में ज़िंदा लाशों के गलने-सड़ने से तअ'फ़्फ़ुन फैल रहा है ख़्वाब बस्तियाँ उजड़ रही हैं समुंदरों ने देखा मौत दाँत निकोसती दनदनाती फिरती है बुढ़िया खिड़की से झाँकते चीख़ी कोई मज़हब उसे लगाम क्यूँ नहीं डालता कैसी शुत्र-ए-बे-महार हुई फिरती है कोई दुआ उस का गला क्यूँ नहीं घोंटती इस मनहूस को तावीज़ घोल कर पिलाओ दरबारों में झाड़ू देती बेवक़ूफ़ बुढ़िया फ़िल्म का वही किरदार हिट होता है जिस ने रीहरसल की हो खिड़की में सन्नाटा फैल गया मौत ने अपना गीत जारी रखा

Unknown

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Unknown.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Unknown's nazm.