"ज़मीर" कभी कभी ये बेचैनी क्यूँ होती है? ये सवालों का तूफ़ान कहाँ से आता है? धड़कने इतनी तेज़ क्यूँ हो जाती हैं? दिल ज़ोर से मेरा क्यूँ घबराता है लगता है, सपने बिखर गए सारे एहसास जम गए, जज़्बात मर गए सारे एक अजीब-सी ख़ामोशी छा गई या ज़ोर से कोई चीखता रहा है या सह में हुए से बच्चे को कोई सीने से अपने लगा रहा है शायद वो मेरा ज़मीर है वो मुझ सेे मेरी पहचान पूछता है जिस बाजार में बेच आया उसे उस ख़रीदार की दुकान पूछता है समझ नहीं आता इन सवालों को कैसे रोकूँ? फिर अचानक एक माजी ज़ेहन में आता है जो सारी आवाज़ों को शांत कर मेरी ओर देख मुस्कुराता है जैसे मुझ सेे कोई उम्मीद लगाए बैठा है
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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"चुप्पियाँ" तेरी ख़ामोशियाँ तड़पाती हैं मुझे ये उदासियाँ सताती हैं मुझे ग़म-ए-दिल का सहारा नहीं है अब तेरा चुप रहना गवारा नहीं है जब तक तुझे मैं सुन सकता हूँ तेरे अल्फ़ाज़ मैं चुन सकता हूँ अब सीने से लगा ले मुझे ये चुप्पियाँ मार न डाले मुझे ये तन्हाइयाँ खलती हैं दिल में बेचैनियाँ पलती हैं कुछ बोल
Vikas Sangam
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"मुश्किल' मुझ में एक सवाल था जो ता-उम्र मुझे मुश्किल में रखा क्यूँ?, वो शख़्स हमारा न हो सका उम्र भर जिसे हम ने दिल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा उस के दिल में कोई राज था जो राज उस ने दिल में रखा बात ही बात में क्या बात आज हो गई? जो उस ने दिल की बात भरी महफ़िल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा ढूँढो उसे कि हाँ गया लम्हा मेरा कहाँ गया जिसे चुरा के ज़माने से हम ने राह-ए-मंज़िल में रखा ता-उम्र इसी सवाल ने, हाँ मुझे मुश्किल में रखा
Vikas Sangam
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"फुटपाथ" चल सकता नहीं जिस्म, मचलता है जज़्बात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ सुख की घटा नहीं छाती, हँसी के बादल नहीं आते बाबा, देखो ना मेरे हिस्से में ख़ुशी के पल नहीं आते अब हर पल इन आँखों से होती ग़मों की बरसात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ
Vikas Sangam
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"अभी जाओ" अभी जाओ की तन्हाई से रुख़्सत हो जाऊँ तो आना दिल रोए, मैं मुस्कुराऊँ तो आना अभी कुछ कहने, सुनने की इच्छा नहीं हाँ, कुछ कह पाऊँ कुछ सुन पाऊँ तो आना अभी जाओ जाओ इस क़दर कि तुम्हें रोकना चाहूँ तो न रोक पाऊँ जाओ इस क़दर कि तुम्हें मुस्कुराता देख मैं भी मुस्कुराऊँ जाओ अभी जाओ अभी जाओ के दर्दों को सीने से लगाना है मुझे अभी जाओ की ख़ुद को कहीं छुपाना है मुझे अभी ग़म है कहीं सीने में जगा हुआ ग़मों से नाता तोड़ लूँ तो आना अपनी आँखें निचोड़ लूँ तो आना अभी जाओ
Vikas Sangam
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"मेरे साथिया" कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन ना रातें बीते ना ही दिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन तुझी से थे ग़म तुुझी से थी ख़ुशी मेरी तूँ ही नहीं तो तबाह है ज़िन्दगी मेरी तूँ चाहत, तूँ हसरत, है तू ही मोहब्बत बिन तेरे जानम बर्बाद आशिक़ी मेरी हर ख़ुशी गई मुझ सेे छीन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन, मेरे साथिया कैसे मैं जीऊँ तेरे बिन
Vikas Sangam
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