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आज के मरहबों को ख़ुद ही हराना है हमें हर दफ़ा 'हैदर-ए-कर्रार' नहीं आएँगे

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दो गज़ जमीँ, सफ़ेद कफ़न, बदहवा से लाश मौत आई और ज़िन्दगी का दाम दे गई

Mohammad Aquib Khan

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देखे जाते नहीं जब बुझते दियों के मंज़र कैसे देखोगे तुम उन जलते घरों के मंज़र पैरवी फूलों की हम यूँँ ही नहीं करते हैं हम ने देखें हैं बहुत कटते सरों के मंज़र

Mohammad Aquib Khan

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ये बात और है कभी मातम नहीं किया लेकिन तुम्हारे हिज्र का ग़म कम नहीं किया इक दर्द सा ही बनके मेरे साथ तू रहे कुछ इस लिए भी ज़ख़्मों पे मरहम नहीं किया

Mohammad Aquib Khan

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कैसे कहें के ज़ीस्त में अव्वल है शा'इरी अब तक हमारे हाथ ही रोटी कमाते हैं

Mohammad Aquib Khan

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हम सेे मिलें न आप हमें कुछ गिला नहीं पर ये कभी न बोलें के अब वास्ता नहीं कुछ इस लिए भी रास्ते अपने अलग हुए वो बोला सर झुकाओ मिरा सर झुका नहीं

Mohammad Aquib Khan

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