कैसे कहें के ज़ीस्त में अव्वल है शा'इरी अब तक हमारे हाथ ही रोटी कमाते हैं
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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दो गज़ जमीँ, सफ़ेद कफ़न, बदहवा से लाश मौत आई और ज़िन्दगी का दाम दे गई
Mohammad Aquib Khan
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ये बात और है कभी मातम नहीं किया लेकिन तुम्हारे हिज्र का ग़म कम नहीं किया इक दर्द सा ही बनके मेरे साथ तू रहे कुछ इस लिए भी ज़ख़्मों पे मरहम नहीं किया
Mohammad Aquib Khan
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हार कर ख़ुद-कुशी जो करते हैं उन सेे कहना अच्छा होता नहीं माँ-बाप को बेवा करना
Mohammad Aquib Khan
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हम सेे मिलें न आप हमें कुछ गिला नहीं पर ये कभी न बोलें के अब वास्ता नहीं कुछ इस लिए भी रास्ते अपने अलग हुए वो बोला सर झुकाओ मिरा सर झुका नहीं
Mohammad Aquib Khan
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उन दिनों इतनी तरक्की तो नहीं थी 'आक़िब' हाँ मगर लोग मददगार हुआ करते थे
Mohammad Aquib Khan
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