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आख़िरी ख़त पढ़ोगे जब मेरा तो ये फ़िक़रा तुम्हें रुला देगा भूल जाना 'शजर' को तुम अपने और तुम को 'शजर' भुला देगा

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ज़ुल्म मज़लूमों पे ढाना छोड़ दो हक़ यतीमों का दबाना छोड़ दो ये नहीं कर सकते तो बेहतर है ये सर को सज्दे में झुकाना छोड़ दो

Shajar Abbas

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ज़ुल्म की मिल के क़मर ऐसे करेंगे ख़म सब दूर हो जाएँगे ये अपने वतन से ग़म सब ख़्वाब अज्दाद ने जो देखा है इक दिन उस की देखना ख़ून से ता'बीर लिखेंगे हम सब

Shajar Abbas

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याद है माज़ी का हर लम्हा मुझे अच्छे से मैं ने जब पहली दफ़ा माँ की दुआएँ ली थीं उस ने होंठों से मिरा चूमा था माथा बढ़कर उस ने हाथों से शजर मेरी बलाएँ ली थीं

Shajar Abbas

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ज़िंदगी उजड़े हुए घर की तरह लगती है बाप का साया अगर सर पे नहीं होता है

Shajar Abbas

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वक़्त दो रिश्ते को थोड़ा सब सही हो जाएगा इस तरह अपने बिछड़ जाने से कुछ हासिल नहीं

Shajar Abbas

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