चले भी आओ मिरे जीते-जी अब इतना भी न इंतिज़ार बढ़ाओ कि नींद आ जाए
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मैं ने बस इतना पूछा था क्या देखते हो भला मैं ने ये कब कहा था मुझे देखना छोड़ दो गीली मिट्टी की ख़ुशबू मुझे सोने देती नहीं मेरे बालों में तुम उँगलियाँ फेरना छोड़ दो
Tajdeed Qaiser
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हम ने उस को इतना देखा जितना देखा जा सकता था लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था
Farrukh Yar
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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अब उस की शादी का क़िस्सा न छेड़ो बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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हर एक बात ज़बाँ से कही नहीं जाती जो चुपके बैठे हैं कुछ उन की बात भी समझो
Mahshar Inayati
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क़सम जब उस ने खाई हम ने ए'तिबार कर लिया ज़रा सी देर ज़िन्दगी को ख़ुश-गवार कर लिया
Mahshar Inayati
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न ग़ैर ही मुझे समझो न दोस्त ही समझो मिरे लिए ये बहुत है कि आदमी समझो
Mahshar Inayati
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लब पे इक नाम हमेशा की तरह और क्या काम हमेशा की तरह
Mahshar Inayati
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उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद कट रही है ज़िन्दगी आराम से
Mahshar Inayati
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